हमास हथियार छोड़ने को तैयार नहीं, इजरायल को फिलस्तीन देश की राह करनी है आसान! ट्रंप की ‘जीत’ या मानवीय विवशता?
गाज़ा की धरती लंबे दौर से संघर्ष, हिंसा, विनाश और तबाही की त्रासदी की गवाह रही है। आज फिर यह एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहाँ शांति की एक हल्की किरण दिखाई देती है, परंतु उसके चारों ओर धुएँ और राख का अंधकार अब भी विद्यमान है। हाल ही में हुए युद्ध-विराम ने न केवल मध्यपूर्व बल्कि समूचे विश्व को राहत की एक साँस दी है। गाजा में अमन-चैन की ओर जो सुखद कदम बढ़े हैं, उनका स्वागत होना चाहिए।
परंतु यह सवाल उतना ही प्रासंगिक है कि क्या यह शांति स्थायी होगी, या यह केवल अगली लड़ाई से पहले का ठहराव भर है? इजरायल और हमास के संघर्ष ने करीब बाइस लाख से अधिक लोगों को बेघर करके भुखमरी के कगार पर पहुंचा दिया है। ऐसे में दोनों पक्षों के लिये समझौते के पहले चरण को पूरी तरह से लागू करना बेहद जरूरी होगा, जिसमें बंधकों व कैदियों की रिहाई, गाजा में मानवीय सहायता को अनवरत जारी रखना और इजरायली सेनाओं की गाजा के मुख्य शहरों से आंशिक वापसी सुनिश्चित करना शामिल है।
यदि सब कुछ ठीक-ठाक रहा, तो इसके बाद ही दूसरे चरण की बातचीत की प्रक्रिया शुरू हो सकती है। यह बेहद मुश्किल चुनौतियों वाला चरण होगा, जिसमें कई संवेदनशील मुद्दे सामने होंगे। सबकी निगाह इस पर होगी कि शांति समझौते के अगले चरण कब पूरे होते हैं और वे सही तरह पूरे होते भी हैं या नहीं?
इस पर संशय इसलिए है, क्योंकि यह स्पष्ट नहीं है कि इजरायली सेना गाजा में कितना पीछे हटेगी और वहाँ के प्रशासन को संचालित करने का कैसा तंत्र तैयार होगा और क्या उस पर हमास सहमत होगा? इसके अतिरिक्त, जहाँ हमास को हथियार छोड़ने हैं, वहीं इजरायल को स्वतंत्र फिलस्तीन देश की राह आसान करनी है। हमास का कहना है कि हथियार तभी छोड़े जाएँगे, जब स्वतंत्र फिलस्तीन का रास्ता साफ होगा। इस पर इजरायल तैयार नहीं दिख रहा है।
अमेरिकी मध्यस्थता वाले युद्धविराम समझौते के बाद हमास ने आखिरकार शेष जीवित बचे बीस इजरायली बंधकों को रिहा कर दिया। हालाँकि, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि अभी भी इजरायल-हमास जोखिमभरा युद्धविराम समझौता नाजुक बना हुआ है। इसकी वास्तविक परीक्षा आने वाले दिनों में होगी।
यह ठीक है कि स्वयं की ओर से प्रस्तावित गाजा शांति समझौते पर अमल शुरू होने के अवसर पर इजरायल पहुंचे अमेरिकी राष्ट्रपति ने अपनी पहल को पश्चिम एशिया में शांति की स्थापना का पथ करार दिया। उन्होंने इजरायली प्रधानमंत्री से ईरान से समझौता करने को कहा, लेकिन ऐसे किसी समझौते की सूरत तब बनेगी, जब ईरान इजरायल को मिटाने की अपनी जिद छोड़ेगा।
एक नाजुक समय में जब युद्धविराम की घोषणा हुई, तो यह केवल एक राजनीतिक निर्णय नहीं है, बल्कि मानवीय विवेक का पुनर्जागरण भी है। यह समझना आवश्यक है कि शांति कोई समझौता नहीं, बल्कि एक अनिवार्य आवश्यकता है। यही कारण है कि यह युद्धविराम पूरी मानवता के लिए एक ‘आशा की किरण’ बनकर उभरा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भले ही इस युद्धविराम को अपनी कूटनीतिक प्रयासों की उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत किया हो, पर सच यह है कि युद्ध तब रुका जब उसकी भयावहता अपनी चरम सीमा पर पहुँच चुकी थी। यह विराम किसी की “कूटनीति की जीत” से अधिक, मानवीय विवशता की उपज है।
वर्तमान समय में सबसे बड़ी चुनौती भूतहा खण्डहर एवं तबाही में तब्दील हो चुके गाजा के पुनर्निर्माण की होगी। दो साल से लगातार जारी युद्ध के चलते यह इलाका मलबे के ढेर में तब्दील हो चुका है।
संयुक्त राष्ट्र, यूरोपीय संघ, अरब लीग और विश्व की सभी बड़ी शक्तियों की जिम्मेदारी है कि वे इस युद्धविराम को केवल घोषणा भर न रहने दें। उसे स्थायी बनाने के लिए एक ठोस मानवीय पुनर्निर्माण योजना तैयार की जाए, जिसमें राजनीतिक समाधान, मानवीय सहायता और संवाद-तीनों को समान महत्व मिले।
इस मामले में इजरायल को ज्यादा उदारता का परिचय देना होगा, क्योंकि इसमें कोई संदेह नहीं है कि वह बहुत ताकतवर है। हमास को भी हिंसा से बचना चाहिए। द्वि-राष्ट्रीय व्यवस्था को जमीन पर ठीक से साकार करना हमास का लक्ष्य होना चाहिए। हमास को अपनी छवि सुधारने की चिंता करनी चाहिए। आज यह युद्धविराम भले ही ‘एक आशा की किरण’ बना हो, परंतु उसे स्थायी प्रकाश में बदलना विश्व समुदाय के विवेक, संवेदनशीलता और सतत प्रयास पर निर्भर करता है।