‘पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई तो किसी की काया निरोगी!’ 190 साल पुराने सूर्य मंदिर की चमत्कारी कहानी, यहाँ दर्शन बिना छठ व्रत अधूरा

सूर्य उपासना और लोक आस्था का महापर्व छठ शनिवार 25 अक्टूबर से नहाय-खाय के साथ शुरू हो जाएगा। रविवार 26 अक्टूबर को खरना के बाद 36 घंटों का निर्जला उपवास प्रारंभ होगा। वहीं, 27 अक्टूबर को छठव्रती अस्ताचलगामी भगवान भास्कर को अर्घ्य देंगे और 28 अक्टूबर को उदयाचलगामी सूर्य को अर्घ्य के साथ महापर्व का समापन होगा।
छठमय हो चुकी राजधानी रांची में ईटीवी भारत (ETV Bharat) आपको एक ऐसे प्राचीन सूर्य मंदिर के बारे में बता रहा है, जिसके बारे में यह मान्यता है कि जो भी भक्त या श्रद्धालु सच्चे मन से यहां आकर भगवान भास्कर की आराधना करते हैं, उनकी सारी मनोकामनाएं पूरी हो जाती है।
चमत्कारी सफलताओं के साक्षी पुजारी
मंदिर में भगवान की अनवरत आराधना करने वाली विंध्यवासिनी देवी बताती हैं कि उनकी चौथी पीढ़ी भगवान भास्कर की सेवा में लगी है। वहीं स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ता राजीव रंजन मिश्रा का भी यही मत है। उन्होंने बताया: “हमने न जानें कितने लोगों को देखा जो यहां आकर भगवान भास्कर की आराधना की और मन्नत पूरी होने पर फिर यहां दर्शन करने आए।”
विंध्यवासिनी देवी ने कहा, “किसी को पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई तो किसी की काया निरोगी हुई।” मन्नत पूरी होने पर भक्त यहां उपहार भी भेंट करते हैं। यह मंदिर भक्तों के लिए कितना ‘सिद्ध’ है, इन घटनाओं से इसका अनुमान लगाया जा सकता है।
नागवंशी राजाओं ने कराया था 190 साल पहले निर्माण
राजीव रंजन मिश्रा बताते हैं कि राजधानी में बड़ा तालाब (विवेकानंद सरोवर) के पास का यह सूर्य मंदिर अति प्राचीन है। उन्होंने बताया कि नागवंशी राजाओं ने इस मंदिर का निर्माण 1836 के आसपास कराया था और तभी से रांची में छठ पूजा की शुरुआत हुई।
छठव्रती बड़ा तालाब में भगवान सूर्य को अर्घ्य देने के बाद इस अति प्राचीन मंदिर में रथ पर सवार सूर्य भगवान का दर्शन और आराधना जरूर करते हैं। करीब 190 वर्ष पुराने इस सूर्य मंदिर में भगवान भास्कर की तीन प्रतिमाएं हैं। आज भी अर्घ्य देने के बाद व्रती इस सूर्य मंदिर में भगवान भास्कर का दर्शन कर ही पारण (उपवास तोड़ना) करते हैं।
असामाजिक तत्व भी नहीं कर पाए मंदिर को नुकसान
राजीव रंजन मिश्रा इस अति प्राचीन मंदिर के महत्व की चर्चा करते हुए कहते हैं कि यह कितना सिद्ध मंदिर है, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि कुछ वर्ष पहले अराजक तत्वों ने इसे नुकसान पहुंचाने की कोशिश की थी, लेकिन प्राचीन मंदिर भवन का बाल बांका भी नहीं हुआ। यह घटना इस मंदिर के चमत्कारी महत्व को और बढ़ा देती है।