नो-स्क्रीन फ्राइडे’ क्यों शुरू कर रहे हैं स्कूल? जानिए कैसे डिवाइस पर बढ़ती निर्भरता बच्चों की कॉग्निटिव एबिलिटी को कर रही है कमजोर।

आज के डिजिटल युग में, खासकर कोविड के बाद से, बच्चों का स्क्रीन टाइम काफी बढ़ गया है। वे मोबाइल और टैबलेट पर पढ़ाई करने या गेम खेलने में अपना अधिकतम समय बिताते हैं। लेकिन, एक नए शोध के अनुसार, बढ़ता स्क्रीन टाइम बच्चों में बेसिक मैथ्स और पढ़ने की समझ को प्रभावित कर रहा है, जिससे उनके मार्क्स में 10 प्रतिशत की कमी देखी गई है।

रिसर्च के चौंकाने वाले खुलासे 2008 से 2023 तक कनाडा के 5,000 से अधिक बच्चों पर किए गए एक शोध में पाया गया कि कम उम्र में स्क्रीन के अत्यधिक उपयोग से बच्चों की कॉग्निटिव एबिलिटी (संज्ञानात्मक क्षमता) कमजोर हो रही है। शोध बताता है कि स्क्रीन टाइम न केवल बच्चों की एकाग्रता को प्रभावित करता है, बल्कि उनकी गहन सोचने की क्षमता को भी कम करता है।

विश्व भारती पब्लिक स्कूल की शिक्षिका मिनाक्षी के अनुसार, बच्चों का ध्यान अब पहले की तुलना में काफी कम हो गया है। वे किताब का एक पेज पढ़ने के बजाय छोटे वीडियो क्लिप्स देखना पसंद करते हैं। यह व्यवहार स्क्रीन पर तुरंत मिलने वाली जानकारी (इंस्टेंट ग्रैटिफिकेशन) का परिणाम है।

डोपामाइन की लत और घटता धैर्य विशेषज्ञों का मानना है कि यूट्यूब शॉर्ट्स, इंस्टाग्राम रील्स और गेमिंग ऐप्स मस्तिष्क में डोपामाइन हार्मोन का स्तर बढ़ाते हैं, जिससे बच्चों को तात्कालिक खुशी मिलती है। बार-बार ऐसा होने से यह आदत लत में बदल जाती है। बच्चों का दिमाग इस तरह की खुशी का आदी हो जाता है, जिसके कारण पारंपरिक पढ़ाई के तरीके उन्हें उबाऊ लगने लगते हैं। यह निरंतर उत्तेजना मस्तिष्क की तंत्रिकाओं को फिर से संरचित करती है, जिससे एकाग्रता और धैर्य में कमी आती है।

स्कूलों ने उठाया कदम अधिकांश पेरेंट्स शिकायत करते हैं कि ऑनलाइन पढ़ाई के लिए खरीदे गए उपकरणों का उपयोग अब पढ़ाई से ज्यादा गेम और वीडियो देखने के लिए हो रहा है। इस चिंता के बीच, कुछ स्कूल बच्चों के स्क्रीन टाइम को कम करने के लिए कदम उठा रहे हैं। स्कूलों ने ‘नो-स्क्रीन फ्राइडे’ शुरू किया है, जिसमें बच्चे स्क्रीन के बजाय कहानियां पढ़ते हैं, पहेलियां हल करते हैं या रचनात्मक गतिविधियों में भाग लेते हैं।

पेरेंट्स के लिए विशेषज्ञ सलाह: विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि पेरेंट्स बच्चों को खाना खाते समय या सोने से पहले डिवाइस का उपयोग न करने दें। इसके बजाय, उन्हें बाहर खेलने, डायरी लिखने या परिवार के साथ समय बिताने जैसी गतिविधियों को प्रोत्साहित करना चाहिए। एक्सपर्ट का मानना है कि समस्या टेक्नोलॉजी नहीं, बल्कि इसका अत्यधिक उपयोग है, और अभिभावकों तथा शिक्षकों को मिलकर बच्चों को डिजिटल अनुशासन सिखाना चाहिए।

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