उत्तराखंड की कुमाऊँनी शादी में दुल्हन को ‘रानी’ क्यों मानते हैं? आज भी डोली में ही क्यों होती है विदाई?
उत्तराखंड के कुमाऊँ क्षेत्र में, विवाह केवल दो परिवारों का मिलन नहीं है, बल्कि यह परंपरा, विश्वास और गहरी सांस्कृतिक आस्थाओं का एक पवित्र संगम है। यहां, दुल्हन को “रानी” के रूप में सम्मानित करने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। यह माना जाता है कि दुल्हन अपने माता-पिता के घर में “लक्ष्मी” का अवतार होती है, और जब वह ससुराल में प्रवेश करती है, तो वह अपने साथ सौभाग्य, शांति और समृद्धि लाती है।
बागेश्वर के आचार्य हेमचंद्र पाठक ने लोकल 18 को बताया कि दुल्हन को “रानी” मानने की कुमाऊँनी परंपरा सिर्फ प्रतीकात्मक नहीं है, बल्कि यह परिवार और समाज द्वारा दिए गए सम्मान का जीता-जागता प्रतीक है। हल्दी समारोह हो, विवाह जुलूस हो या विदाई—विवाह के हर चरण में दुल्हन को सर्वोच्च स्थान दिया जाता है।
इस वजह से दुल्हन जाती थी पालकी में
कुमाऊँनी लोककथाओं के अनुसार, दुल्हन जिस भी घर में प्रवेश करती है, वह नया सौभाग्य लाती है। इसलिए, उसकी विदाई किसी राजकुमारी के जुलूस की तरह मनाई जाती है।
- ऐतिहासिक कारण: कुमाऊँ में दुल्हनों को डोली (पालकी) में विदा करने की परंपरा बहुत पुरानी है। प्राचीन समय में पहाड़ों में सड़कें नहीं थीं और रास्ते दुर्गम और पहाड़ी होते थे, जिससे डोली ही सबसे सुरक्षित और सबसे सम्मानित परिवहन माध्यम थी।
- सम्मान का प्रतीक: चार लोग दुल्हन की डोली उठाते थे, जिसे केवल परिवहन का साधन नहीं बल्कि सम्मान का प्रतीक माना जाता था। यह नए परिवार को संकेत देता था कि दुल्हन को अत्यंत सम्मान और सुरक्षा के साथ उसके नए घर ले जाया जा रहा है। डोली के गीत, पारंपरिक वाद्य यंत्रों और भावुक विदाई समारोह ने इस यात्रा को और भी पवित्र बना दिया।
आधुनिक युग में भी परंपरा कायम
समय बदला है, सड़कें बन गई हैं, वाहनों का उपयोग बढ़ गया है, लेकिन कुमाऊँ में यह परंपरा पूरी तरह से छोड़ी नहीं गई है। आज भी, कई गांवों और पारंपरिक परिवारों में, दुल्हन को प्रतीकात्मक रूप से पालकी में कुछ कदम चलकर विदा किया जाता है।
यह केवल एक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि एक संदेश है कि नया परिवार दुल्हन का रानी की तरह स्वागत कर रहा है। यह माना जाता है कि पालकी में विदाई शुभ होती है और यह एक स्थिर, सुखी और समृद्ध विवाहित जीवन सुनिश्चित करती है।
यह कुमाऊँनी परंपरा संस्कृति से जुड़ाव और परिवार के प्रति आदर को दर्शाती है। आधुनिकता के इस दौर में भी, दुल्हन को “रानी” के रूप में सम्मानित करने की यह परंपरा कुमाऊँ की सांस्कृतिक विरासत को जीवित रखे हुए है।