‘प्रोजेनी मैपिंग’ की जाँच शुरू! वोटर लिस्ट में ‘घुसपैठियों’ की आशंका, 50 विधानसभा क्षेत्रों में चौंकाने वाला आंकड़ा
कोलकाता: स्पेशल समरी रिविजन (SIR) के दो चरण—फॉर्म वितरण, संग्रह और डिजिटलीकरण—पूरे हो चुके हैं। अब बूथ लेवल अधिकारियों (BLO) की भूमिका समाप्त हो गई है, और गुरुत्वाकर्षण इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर (ERO) और जिला निर्वाचन अधिकारियों (DEO) पर आ गया है। अब फॉर्मों की बारीकी से जाँच होगी कि आवेदक भारत का नागरिक है या नहीं और क्या आवेदन में कोई त्रुटि है। यह सत्यापन प्रक्रिया दो समानांतर भागों में चल रही है: सेल्फ मैपड और प्रोजेनी मैपिंग। आयोग का मुख्य फोकस अब दूसरे भाग पर है।
क्या है ‘प्रोजेनी मैपिंग’?
‘प्रोजेनी मैपिंग’ शब्द अभी भी आम लोगों के लिए नया है। चुनाव आयोग के निर्देशानुसार, जिन लोगों का नाम 2002 की मतदाता सूची में नहीं था, लेकिन उन्होंने अपने माता-पिता या दादा-दादी के नाम का उपयोग करके नया फॉर्म भरा है, उनकी जानकारी की जाँच करना ही ‘प्रोजेनी मैपिंग’ कहलाता है। मुख्य रूप से, उन बूथों की फिर से जाँच करने का निर्देश दिया गया है जहाँ वंशानुगत मिलान के आधार पर नए मतदाताओं की संख्या सबसे अधिक पाई गई है।
किन जानकारियों का सत्यापन चल रहा है?
- फॉर्म में दिए गए परिवार के सदस्य या उत्तराधिकारियों की जानकारी सही है या नहीं।
- आवश्यक दस्तावेज़ (जैसे जन्म प्रमाण पत्र, आधार/वोटर आईडी, रिश्ते का प्रमाण) संलग्न हैं या नहीं।
- नाम, आयु, पता, संबंध आदि में कोई गलती या विसंगति है या नहीं।
- इसके अलावा, मृत और डुप्लीकेट मतदाताओं की जानकारी की भी जाँच की जा रही है।
आयोग के चौंकाने वाले आँकड़े
रिकॉर्ड के अनुसार, मंगलवार शाम 5 बजे तक कुल 46 लाख 20 हजार एन्यूमरेशन फॉर्म वापस आए हैं। इनमें से 22 लाख 28 हजार मृत मतदाता, 6 लाख 41 हजार लापता, 16 लाख 22 हजार स्थानांतरित और 1 लाख 5 हजार डबल एंट्री वाले मतदाता शामिल हैं।
आयोग के हाथ आए आँकड़ों में 50 विधानसभा क्षेत्रों की तस्वीर ‘हैरान’ करने वाली है। इन क्षेत्रों में 2002 के बाद मतदाता बनने वालों की संख्या सबसे अधिक है, जो कुछ जगहों पर 62 प्रतिशत, तो कुछ जगहों पर 66 प्रतिशत तक है। यानी 2002 से पहले इन विधानसभाओं में केवल 35 प्रतिशत मतदाता थे! आयोग का सवाल है—क्या उस 65 प्रतिशत में कोई घुसपैठिया तो नहीं है?
मुर्शिदाबाद, भंगोड़, मेटियाबुर्ज में असामान्य वृद्धि
‘प्रोजेनी मैपिंग’ जहाँ असामान्य रूप से अधिक हुई है, वे जगहें अब आयोग के स्कैनर पर हैं। जैसे—
- समसेरगंज (मुर्शिदाबाद): सेल्फ मैपड मतदाताओं की संख्या सिर्फ 68 हजार 499 है। लेकिन ‘प्रोजेनी मैपड’ मतदाताओं की संख्या 1 लाख 63 हजार 434 है। यानी 2002 की सूची की तुलना में 238 प्रतिशत अधिक!
- मेटियाबुर्ज (कोलकाता): कुल मतदाता 2 लाख 63 हजार 29 हैं। सेल्फ मैपड 69 हजार 499 हैं। लेकिन प्रोजेनी मैपिंग 1 लाख 21 हजार 241 की हुई है। यह सेल्फ मैपिंग की तुलना में लगभग 175 प्रतिशत अधिक है।
आयोग की निगरानी में अन्य क्षेत्र सूती, रेजीनगर, चोपड़ा, बेलडांगा, भंगोड़, बशीरहाट और देगंगा हैं। सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि इन क्षेत्रों में जिन लोगों का नाम 2002 के बाद जोड़ा गया है, उनमें से कई की उम्र अब 50 से 65 साल है। यानी 2002 में उनके पास मतदान का अधिकार होने के बावजूद उनका नाम बाद में क्यों आया?
पिछले कुछ महीनों में, बांग्लादेशी घुसपैठियों द्वारा भारतीय नागरिकों को माता-पिता बताकर वोटर कार्ड बनवाने की कई शिकायतें सामने आई हैं। आयोग अब यह देख रहा है कि दूध से पानी को छानकर कितना बाहर निकाला जा सकता है। फिलहाल, निर्वाचन आयोग ने इन ‘प्रोजेनी’ मैपड मतदाताओं पर विचार-विमर्श शुरू कर दिया है।