77 साल पुराने किराएदारी विवाद पर राजस्थान हाई कोर्ट का बड़ा फैसला, वारिसों को माना ‘संयुक्त किराएदार’
राजस्थान हाई कोर्ट ने 77 साल पुराने एक ऐतिहासिक किराएदारी विवाद में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि मूल किराएदार की मृत्यु के बाद उसके कानूनी वारिस ‘स्वतंत्र सह-किराएदार’ नहीं, बल्कि ‘संयुक्त किराएदार’ (Joint Tenants) होते हैं। जस्टिस विपिन गुप्ता की एकल पीठ ने कहा कि यदि किसी एक संयुक्त किराएदार के खिलाफ बेदखली का आदेश दिया जाता है, तो वह सभी वारिसों पर बाध्यकारी होगा।
क्या था मामला? यह विवाद 15 फरवरी 1949 को शुरू हुआ था, जब तत्कालीन जमींदार बालकिशन ने अपनी संपत्ति जमनालाल और बंशीधर को मात्र ₹5 महीने के किराए पर दी थी। 2016 में रेंट ट्रिब्यूनल ने बेदखली का आदेश दिया था, जिसे वारिसों ने यह कहते हुए चुनौती दी कि उन्हें केस में पक्षकार नहीं बनाया गया था।
हाई कोर्ट का कड़ा रुख: अदालत ने कहा कि कानून की नजर में सभी वारिस एक ही इकाई हैं। किराएदारी अविभाज्य है और इसे टुकड़ों में नहीं देखा जा सकता। कोर्ट ने ‘मौखिक बिक्री’ के दावे को भी सिरे से खारिज कर दिया और कहा कि अचल संपत्ति का हस्तांतरण केवल पंजीकृत दस्तावेजों के जरिए ही संभव है। सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए हाई कोर्ट ने निचली अदालत के बेदखली आदेश को बरकरार रखा है।