असम चुनाव 2026: भाजपा काटने जा रही है 30 विधायकों के टिकट! क्या है हिमंता का नया प्लान?

असम विधानसभा चुनाव 2026 के लिए सियासी बिसात बिछ चुकी है। राज्य में लगातार तीसरी बार सत्ता का स्वाद चखने के लिए भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) एक बड़े और कड़े बदलाव की तैयारी में है। विश्वसनीय सूत्रों के अनुसार, आगामी चुनाव में भाजपा अपने कई मौजूदा विधायकों के टिकट काट सकती है। पार्टी इस बार केवल ‘जिताऊ’ और ‘क्लीन इमेज’ वाले उम्मीदवारों पर ही दांव लगाएगी।
सूत्रों का कहना है कि पार्टी के आंतरिक सर्वे में जिन विधायकों का रिपोर्ट कार्ड खराब मिला है, उन्हें इस बार चुनावी मैदान से बाहर रखा जाएगा। भाजपा की रणनीति 25 से 30 नए और युवा चेहरों को मौका देने की है, ताकि एंटी-इनकंबेंसी (सत्ता विरोधी लहर) को कम किया जा सके। उम्मीदवार चयन की प्रक्रिया में प्रदर्शन और जनता के बीच उनकी लोकप्रियता को ही मुख्य आधार बनाया गया है।
मार्च में बज सकता है चुनावी बिगुल चुनाव आयोग के सूत्रों के अनुसार, मार्च के दूसरे सप्ताह तक चुनाव की तारीखों का ऐलान हो सकता है। चुनाव की घोषणा होते ही राज्य में आदर्श आचार संहिता लागू हो जाएगी। राजनीतिक दलों को प्रचार के लिए लगभग 25 दिनों का समय मिल सकता है और अप्रैल के पहले सप्ताह से मतदान प्रक्रिया शुरू होने की संभावना है। भाजपा मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा के नेतृत्व में ही मैदान में उतरेगी, जिन्होंने पहले ही विकास और हिंदुत्व के एजेंडे को धार देनी शुरू कर दी है।
बीजेपी की माइक्रो और मैक्रो रणनीति भाजपा ने इस बार चुनाव प्रचार को दो श्रेणियों में बांटा है। ‘मैक्रो’ स्तर पर मोदी सरकार की बुनियादी ढांचागत योजनाएं, नारी सशक्तिकरण, सेमीकंडक्टर प्लांट जैसे बड़े विकास कार्य और हिंदुत्व के मुद्दे शामिल होंगे। वहीं, विपक्ष और कांग्रेस नेता गौरव गोगोई के खिलाफ भी तीखा हमला बोला जाएगा। दूसरी ओर, ‘माइक्रो’ स्तर पर भाजपा ने जमीनी समस्याओं पर ध्यान केंद्रित किया है। राज्य सरकार ने ब्लॉक और जिला स्तर पर लगभग 100 स्थानीय समस्याओं की पहचान की है, जिनमें चाय बागान श्रमिकों, आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं और सरकारी कर्मचारियों के मुद्दे प्रमुख हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता को भुनाने के लिए भाजपा ने उनके 8 से 10 मेगा रैलियों की योजना बनाई है। इसके अलावा, हाल ही में असम कैबिनेट द्वारा ‘चाय जनजातियों’ के लिए नौकरियों में आरक्षण और महिला उद्यमियों के लिए वित्तीय सहायता जैसे फैसलों ने चुनावी माहौल को भाजपा के पक्ष में करने की कोशिश की है। अब देखना यह होगा कि भाजपा का यह ‘क्लीन-अप ऑपरेशन’ उसे सत्ता की हैट्रिक लगाने में कितनी मदद करता है।