ब्रेकअप का मतलब रेप नहीं!’ कोलकाता हाई कोर्ट का बड़ा फैसला, शादी न होने पर दर्ज नहीं होगा केस

कलकत्ता उच्च न्यायालय ने आपसी सहमति से बने संबंधों को लेकर एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। न्यायमूर्ति चैताली चटर्जी दास की एकल पीठ ने स्पष्ट किया है कि यदि दो वयस्क आपसी सहमति से लंबे समय तक शारीरिक संबंध में रहते हैं, तो रिश्ता टूटने के बाद उसे ‘बलात्कार’ नहीं कहा जा सकता। अदालत ने अनिर्बान मुखर्जी नाम के व्यक्ति के खिलाफ उसकी पूर्व प्रेमिका द्वारा दर्ज कराई गई प्राथमिकी (FIR) को रद्द कर दिया।

मामले के अनुसार, महिला ने आरोप लगाया था कि २०१७ से उनके बीच प्रेम संबंध थे और २०१८ में उसे शराब पिलाकर जबरन शारीरिक संबंध बनाए गए। महिला का यह भी दावा था कि शादी का झांसा देकर पांच साल तक उसका यौन शोषण किया गया और उसे जबरन गर्भपात (Abortion) के लिए मजबूर किया गया।

हालांकि, अदालत ने जब २०१७ से २०२२ के बीच दोनों के दीघा और गोवा जैसे पर्यटन स्थलों पर साथ रुकने के दस्तावेज़ और होटल रिकॉर्ड देखे, तो कहानी कुछ और ही निकली। न्यायमूर्ति ने कहा कि महिला शिक्षित और वयस्क है। अगर २०१८ में उसके साथ ‘जबरदस्ती’ हुई थी, तो वह अगले चार साल तक उसी व्यक्ति के साथ अपनी मर्जी से होटलों में क्यों रुकती रही? अदालत ने यह भी पाया कि गर्भपात के समय महिला ने कोई शिकायत नहीं की थी, जो दर्शाता है कि वह उसकी सहमति से था।

हाई कोर्ट ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा, “रिश्ते का टूटना हमेशा शादी के वादे से मुकरने का मामला नहीं होता। सहमति से बने लंबे रिश्तों में बाद में बलात्कार की धाराएं लगाना कानून का दुरुपयोग है।” अदालत ने अनिर्बान के खिलाफ आईपीसी की धारा ३७६, ३१३ और ५०६ के तहत दर्ज सभी आरोपों को खारिज कर दिया है।

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