‘बलात्कार’ और ‘बलात्कार के प्रयास’ में अंतर! छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने २० साल पुराने केस में बदला फैसला

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने हाल ही में बलात्कार के एक २० साल पुराने मामले में महत्वपूर्ण कानूनी टिप्पणी की है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि पुरुष जननांग का प्रवेश (Penetration) नहीं हुआ है, तो केवल जननांगों का स्पर्श या वीर्यपात होना ‘बलात्कार’ की श्रेणी में नहीं आएगा। इसे भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा ३७५ के बजाय धारा ३৭৬/৫১১ के तहत ‘बलात्कार का प्रयास’ माना जाएगा।
क्या था पूरा विवाद? मामला २१ मई २००४ का है, जब एक व्यक्ति पर एक युवती को जबरन घर ले जाकर यौन उत्पीड़न करने का आरोप लगा था। २००५ में निचली अदालत ने उसे दोषी मानते हुए ७ साल की कड़ी सजा सुनाई थी। हालांकि, आरोपी के वकील ने दलील दी कि पीड़िता की मेडिकल रिपोर्ट के अनुसार उसका ‘हाइमन’ (Hymen) सुरक्षित था, जो साबित करता है कि बलात्कार नहीं हुआ था।
हाईकोर्ट का फैसला और सजा में बदलाव: जस्टिस की पीठ ने सुनवाई के दौरान पाया कि पीड़िता के बयानों में विरोधाभास था। कोर्ट ने कहा कि बलात्कार के अपराध के लिए प्रवेश अनिवार्य शर्त है।
- अदालत ने धारा ३७६(१) के तहत दी गई सजा को रद्द कर दिया।
- अब आरोपी को ‘बलात्कार के प्रयास’ का दोषी पाया गया है।
- ७ साल की सजा को घटाकर अब ३ साल ६ महीने कर दिया गया है और २०० रुपये का जुर्माना लगाया गया है।
अदालत ने आरोपी को शेष सजा काटने के लिए दो महीने के भीतर आत्मसमर्पण करने का आदेश दिया है। यह फैसला कानूनी गलियारों में चर्चा का विषय बना हुआ है क्योंकि यह यौन अपराधों में ‘प्रवेश’ की तकनीकी अनिवार्यता को रेखांकित करता है।