अलविदा ‘चौरंगी’ के जादूगर! दिग्गज साहित्यकार मणिशंकर मुखर्जी ‘शंकर’ का ९२ वर्ष की आयु में निधन

बांग्ला साहित्य के एक स्वर्णिम युग का आज अंत हो गया। दिग्गज साहित्यकार मणिशंकर मुखर्जी, जिन्हें दुनिया ‘शंकर’ के नाम से जानती थी, ९२ वर्ष की आयु में इस नश्वर संसार को त्याग कर चले गए। उनके निधन से न केवल बंगाल बल्कि पूरे भारतीय साहित्य जगत में शोक की लहर दौड़ गई है। १९५५ में अपने पहले उपन्यास ‘कतो अजानारे’ (कितने अनजान) से साहित्य की दुनिया में कदम रखने वाले शंकर ने अपनी लेखनी से कोलकाता के उन कोनों को उजागर किया, जिनसे लोग अब तक अनभिज्ञ थे। उनके पहले उपन्यास के केंद्र में कलकत्ता उच्च न्यायालय के अंतिम अंग्रेज बैरिस्टर नोएल फ्रेडरिक बरवेल थे, जिनके अनुभवों ने शंकर की लेखनी को एक नई दिशा दी।

१९६२ में प्रकाशित उनका कालजयी उपन्यास ‘चौरंगी’ आज भी पाठकों की पहली पसंद है। इस उपन्यास ने होटल संस्कृति के पीछे छिपे मानवीय संघर्षों और रिश्तों की कड़वाहट को बखूबी पेश किया था। महान फिल्मकार सत्यजीत रे उनके लेखन के इतने कायल थे कि उन्होंने शंकर के उपन्यासों ‘जन अरण्य’ और ‘सीमाबद्ध’ पर फिल्में बनाईं। ‘जन अरण्य’ में जिस तरह से बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और एक शिक्षित युवक के नैतिक पतन की कहानी दिखाई गई थी, वह आज के समय में भी उतनी ही प्रासंगिक है। शंकर ने अपनी कहानियों के माध्यम से मध्यम वर्ग के लालच और समाज की विसंगतियों पर गहरा प्रहार किया था।

अपने लंबे साहित्यिक जीवन में उन्होंने कई उपलब्धियां हासिल कीं। २०२० में उन्हें उनकी कृति ‘एका एका एकाशी’ के लिए प्रतिष्ठित साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। वह २०१९ में कोलकाता के ‘शेरिफ’ भी रहे और २०१८ में उत्तर बंगाल विश्वविद्यालय ने उन्हें डी.लिट की मानद उपाधि से नवाजा था। महान निर्देशक ऋत्विक घटक भी उनके काम से प्रभावित थे और उनके उपन्यास पर नाटक बनाना चाहते थे। आज जब ‘चौरंगी’ का वह कथावाचक खामोश हो गया है, तो कोलकाता की गलियों में एक अजीब सा सन्नाटा पसर गया है। बंगाल की मुख्यमंत्री और अन्य गणमान्य व्यक्तियों ने उनके निधन पर गहरा दुख व्यक्त किया है।

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