ममता सरकार को सुप्रीम कोर्ट का बड़ा झटका! SIR विवाद पर कहा- ‘हमारे जज किसी के दबाव में नहीं आते

पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष गहन संशोधन (SIR) को लेकर चल रहे कानूनी युद्ध में ममता बनर्जी सरकार को शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट से करारी शिकस्त मिली है। राज्य सरकार ने SIR प्रक्रिया में शामिल न्यायिक अधिकारियों के प्रशिक्षण (Training) पर आपत्ति जताते हुए दावा किया था कि न्यायपालिका को प्रभावित करने की कोशिश की जा रही है। हालांकि, प्रधान न्यायाधीश सूर्य कांत की पीठ ने इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए मामले की सुनवाई से इनकार कर दिया।

कपिल सिब्बल की दलीलें और कोर्ट का रुख राज्य सरकार की ओर से पेश वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने अदालत का ध्यान खींचते हुए कहा कि चुनाव आयोग ने न्यायिक अधिकारियों के लिए एक गुप्त ‘ट्रेनिंग मॉड्यूल’ जारी किया है। सिब्बल ने आरोप लगाया कि “अदालती आदेशों के बावजूद पर्दे के पीछे से कुछ अजीब चीजें हो रही हैं और अधिकारियों को निर्देशित किया जा रहा है कि उन्हें क्या स्वीकार करना है और क्या नहीं।”

न्यायपालिका की गरिमा पर सीजेआई की टिप्पणी सिब्बल की दलीलों पर असंतोष व्यक्त करते हुए प्रधान न्यायाधीश सूर्य कांत ने कहा, “हम अपने न्यायिक अधिकारियों को अच्छी तरह जानते हैं। उन्हें किसी भी चीज से प्रभावित नहीं किया जा सकता।” न्यायमूर्ति जयमाल्य बागची ने भी कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि अदालत का पिछला आदेश पूरी तरह स्पष्ट है और किसी भी पक्ष को इसके उल्लंघन की अनुमति नहीं दी जाएगी। अदालत ने स्पष्ट किया कि वोटर लिस्ट की शुद्धता के लिए नियुक्त किए गए न्यायिक अधिकारी ही अंतिम फैसला लेंगे।

विवाद का मूल कारण गौरतलब है कि 20 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट ने बंगाल में विवादित मतदाता सूची की जांच के लिए मौजूदा और पूर्व जिला न्यायाधीशों को तैनात करने का निर्देश दिया था। निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए झारखंड और ओडिशा से भी न्यायिक अधिकारियों को लाने की अनुमति दी गई थी। राज्य सरकार इसी न्यायिक हस्तक्षेप के खिलाफ थी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के आज के फैसले ने साफ कर दिया है कि SIR प्रक्रिया अब पूरी तरह से स्वतंत्र न्यायिक निगरानी में ही पूरी होगी।

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