बंगाल चुनाव से पहले बस मालिकों की बड़ी मांग, क्या इस बार नहीं मिलेंगी बसें?

पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव की आहट के साथ ही प्रशासनिक तैयारियां तेज हो गई हैं। चुनाव आयोग जल्द ही तारीखों का ऐलान कर सकता है। चुनाव संपन्न कराने के लिए मतदान कर्मियों और केंद्रीय सुरक्षा बलों की आवाजाही हेतु बड़ी संख्या में निजी बसों का अधिग्रहण किया जाता है। हालांकि, इस बार ‘ज्वाइंट काउंसिल ऑफ बस सिंडिकेट’ ने सरकार के सामने अपनी कड़ी शर्तें और नई किराया सूची रख दी है, जिससे परिवहन विभाग की चिंताएं बढ़ गई हैं।

किराए पर विवाद की मुख्य वजह: बस मालिकों का कहना है कि पिछले आठ वर्षों से राज्य में निजी बसों के किराए में कोई वृद्धि नहीं हुई है, जबकि डीजल और रखरखाव की लागत कई गुना बढ़ गई है। संगठन के महासचिव तपन बनर्जी ने परिवहन मंत्री स्नेहाशीष चक्रवर्ती और परिवहन सचिव सौमित्र मोहन को पत्र लिखकर स्पष्ट किया है कि पुरानी दरों पर बसें देना अब मुमकिन नहीं है।

क्या है बस मालिकों की मांग? सिंडिकेट ने मांग की है कि वर्तमान बाजार दर के अनुसार किराया तय किया जाए। उनकी प्रस्तावित सूची इस प्रकार है:

  • मिनी बस: ईंधन खर्च के अलावा ₹4,000 प्रतिदिन।
  • साधारण बस: ईंधन खर्च के अलावा ₹4,500 प्रतिदिन।
  • एक्सप्रेस/लग्जरी बस: ईंधन खर्च के अलावा ₹5,000 प्रतिदिन।
  • स्टाफ खर्च: ड्राइवर और खलासी के भोजन के लिए ₹500 प्रतिदिन।

बकाया भुगतान और अग्रिम की शर्त: बस मालिकों में इस बात को लेकर भारी नाराजगी है कि 2023 पंचायत चुनाव और 2024 लोकसभा चुनाव का पैसा कई जिलों में अभी तक बकाया है। इसे देखते हुए, इस बार मालिकों ने मांग की है कि कुल किराए का 75% हिस्सा अग्रिम (Advance) के रूप में दिया जाए। शेष 25% राशि चुनाव खत्म होने के 15 दिनों के भीतर बिल जमा करने पर मिलनी चाहिए।

कोलकाता और अन्य जिलों में आरटीओ (RTO) और पुलिस प्रशासन ने बसों का अधिग्रहण शुरू कर दिया है। लेकिन यदि सरकार और बस मालिकों के बीच सहमति नहीं बनी, तो चुनाव के दौरान आम जनता को भारी परिवहन संकट का सामना करना पड़ सकता है। अब गेंद सरकार के पाले में है कि वह इन मांगों पर क्या रुख अपनाती है।

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