शीतला अष्टमी पर ‘बासी’ खाने का भोग क्यों? इसके पीछे छुपा है गहरा वैज्ञानिक रहस्य, जानें यहाँ

हिंदू धर्म में शीतला माता को स्वच्छता और आरोग्यता की देवी माना जाता है। चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की सप्तमी और अष्टमी तिथि को ‘शीतला सप्तमी’ और ‘अष्टमी’ के रूप में मनाया जाता है, जिसे उत्तर भारत में ‘बसौड़ा’ भी कहते हैं। इस वर्ष यह पर्व ১০ और ১১ मार्च को मनाया जाएगा। इस पूजा की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इस दिन माता को ताजे भोजन के बजाय एक दिन पहले बना हुआ यानी ‘बासी’ भोजन अर्पित किया जाता है।

शीतला माता और ऋतु परिवर्तन का संबंध धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, शीतला माता माँ पार्वती का ही एक रूप हैं। उनकी पूजा विशेष रूप से गर्मी की शुरुआत में की जाती है क्योंकि इस समय स्मॉल पॉक्स (चेचक) जैसी मौसमी बीमारियों का खतरा सबसे अधिक होता है। माता शीतला की कृपा से शरीर शीतल रहता है और बीमारियां दूर भागती हैं।

ठंडा भोजन ही क्यों? क्या कहता है विज्ञान? बसौड़ा के दिन ठंडा भोजन करने के पीछे एक ठोस वैज्ञानिक और आयुर्वेदिक तर्क है। चैत्र का महीना सर्दी और गर्मी का संधिकाल होता है। इस समय पाचन तंत्र संवेदनशील हो जाता है। आयुर्वेद के अनुसार, बदलते मौसम में गर्म और गरिष्ठ भोजन शरीर में गर्मी (पित्त) बढ़ा सकता है, जिससे संक्रमण का खतरा रहता है। ठंडा भोजन शरीर के तापमान को संतुलित रखने में मदद करता है। यह परंपरा हमें संदेश देती है कि आने वाली भीषण गर्मी के लिए अब शरीर को शीतल आहार की जरूरत है।

बसौड़ा की परंपरा पूजा से एक रात पहले ही घरों में मीठे भजिए, पूड़ी, चावल और हलवा तैयार कर लिया जाता है। अगले दिन सुबह माता को भोग लगाने के बाद घर के सभी सदस्य इसी ठंडे भोजन को ग्रहण करते हैं। इस दिन घर में चूल्हा जलाना वर्जित माना जाता है।

माता शीतला की यह पूजा हमें भक्ति के साथ-साथ स्वच्छता और सही खान-पान के महत्व को भी समझाती है।

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