बीजेपी की लिस्ट में एक भी मुस्लिम चेहरा नहीं, ममता ने 47 अल्पसंख्यकों को उतारा; क्या यही बनेगा जीत का फॉर्मूला?

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के लिए सियासी बिसात बिछ चुकी है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अपनी रणनीति से यह साफ कर दिया है कि वह अपने सबसे मजबूत किले—अल्पसंख्यक और महिला वोटबैंक—को किसी भी कीमत पर दरकने नहीं देंगी। तृणमूल कांग्रेस (TMC) की नई उम्मीदवार सूची ने राजनीतिक विश्लेषकों को चौंका दिया है। 2026 के इस चुनावी दंगल में ममता ने अल्पसंख्यकों के साथ-साथ ‘नारी शक्ति’ पर जो दांव खेला है, वह विरोधियों के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है।

अल्पसंख्यक उम्मीदवारों की संख्या में भारी बढ़ोतरी TMC ने इस बार अल्पसंख्यक प्रतिनिधित्व को लेकर बड़ा जोखिम और रणनीति अपनाई है। 2021 में जहां पार्टी ने 35 मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट दिया था, वहीं 2026 में यह संख्या बढ़ाकर 47 कर दी गई है। बंगाल की करीब 30 प्रतिशत मुस्लिम आबादी चुनाव परिणामों को प्रभावित करने की ताकत रखती है। राज्य की 294 सीटों में से 125 सीटों पर मुस्लिम मतदाता निर्णायक भूमिका में हैं, जिनमें से 70 सीटों पर वे सीधे तौर पर हार-जीत तय करते हैं। दूसरी ओर, बीजेपी की पहली सूची में किसी भी मुस्लिम उम्मीदवार का न होना चर्चा का विषय बना हुआ है।

महिला और आरक्षित वर्ग पर फोकस ममता बनर्जी हमेशा से महिला मतदाताओं की पसंदीदा रही हैं। इस बार उन्होंने महिला उम्मीदवारों की संख्या 50 से बढ़ाकर 52 कर दी है। इसके विपरीत, बीजेपी की 144 उम्मीदवारों की सूची में केवल 11 महिलाएं हैं और वामपंथियों की 192 सीटों पर केवल 28 महिलाएं। इसके अलावा, TMC ने एससी-एसटी (SC-ST) कार्ड भी बखूबी खेला है। आरक्षित सीटों से अधिक कुल 95 एससी-एसटी उम्मीदवारों को टिकट देकर ममता ने वंचित वर्गों को साधने की कोशिश की है। टीएमसी का यह ‘सोशल इंजीनियरिंग’ मॉडल क्या उन्हें फिर से सत्ता की कुर्सी तक पहुंचाएगा, यह देखना दिलचस्प होगा।

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