अधिकारियों के तबादले पर ममता बनर्जी का ‘चंडी’ रूप! चुनाव आयोग के फैसले को बताया ‘अघोषित आपातकाल’, जनता से की अपील!

बंगाल विधानसभा चुनाव २०२६ के लिए बिगुल बजते ही राज्य की प्रशासनिक मशीनरी पर चुनाव आयोग (EC) की ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ ने ममता बनर्जी को बेहद नाराज कर दिया है। मुख्य सचिव, गृह सचिव और डीजीपी समेत ५० से अधिक वरिष्ठ अधिकारियों के ताबड़तोड़ तबादलों पर मुख्यमंत्री ने कड़ा रुख अपनाया है। गुरुवार को उन्होंने इस स्थिति की तुलना ‘अघोषित आपातकाल’ और ‘परोक्ष राष्ट्रपति शासन’ से करते हुए जनता से लोकतांत्रिक तरीके से इसका विरोध करने की अपील की।
मुख्यमंत्री के मुख्य आरोप: ममता बनर्जी ने आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठाते हुए इसे बीजेपी के इशारे पर किया गया कदम बताया। उनके कड़े प्रहारों के मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं:
- संवैधानिक मर्यादा का उल्लंघन: ममता का आरोप है कि आयोग ने राज्य सरकार से परामर्श किए बिना और बिना किसी ठोस कारण के मध्यरात्रि में तबादले किए, जो सहकारी संघवाद (Cooperative Federalism) के खिलाफ है।
- भेदभाव का आरोप: उन्होंने मुख्य सचिव नंदिनी चक्रवर्ती को हटाने पर इसे ‘बंगाली और महिला विरोधी’ मानसिकता करार दिया। साथ ही, गैर-बंगाली अधिकारियों के तबादले को लेकर भी केंद्र को घेरा।
- बीजेपी का दखल: ममता ने कहा कि बीजेपी चुनाव हारने के डर से अब संस्थानों का दुरुपयोग कर रही है। उन्होंने जनता से कहा कि अगर तबादलों के बाद राज्य में कोई आपदा या कानून-व्यवस्था की समस्या आती है, तो इसके लिए सीधे तौर पर आयोग और बीजेपी जिम्मेदार होंगे।
जनता ही असली ताकत: मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया कि भले ही अधिकारी हटा दिए गए हों, लेकिन वे सभी अंततः राज्य सरकार के ही अंग हैं और चुनाव के बाद आचार संहिता खत्म होते ही उन्हें फिर से बहाल किया जाएगा। उन्होंने सोशल मीडिया पर पोस्ट कर कहा कि बंगाल कभी किसी की दादागिरी के आगे नहीं झुका है और इस बार भी जनता मतदान के जरिए बीजेपी को सबक सिखाएगी।