“बंगाल से ज्यादा अफसरों के तबादले दूसरे राज्यों में हुए!” हाईकोर्ट में चुनाव आयोग का बड़ा दावा!

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के बीच प्रशासनिक अधिकारियों और पुलिस अफसरों के तबादले का मामला अब कानूनी पेच में फंस गया है। कोलकाता हाईकोर्ट में दायर जनस्वार्थ याचिका पर सुनवाई पूरी हो गई है, लेकिन मुख्य न्यायाधीश सुजॉय पाल और न्यायमूर्ति पार्थसारथी सेन की खंडपीठ ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग ने अदालत में दलील दी कि पश्चिम बंगाल में किए गए तबादले अन्य राज्यों की तुलना में काफी कम हैं।
आयोग के चौंकाने वाले आंकड़े आयोग के वकील ने अदालत को बताया कि निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए अधिकारियों का तबादला एक सामान्य प्रक्रिया है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि बिहार में पिछले चुनाव के दौरान 48 अधिकारियों को बदला गया था, जबकि उत्तर प्रदेश में यह संख्या 83 और महाराष्ट्र में 61 थी। तुलनात्मक रूप से पश्चिम बंगाल में केवल 23 आईएएस और आईपीएस अधिकारियों का ही तबादला किया गया है। आयोग ने यह भी स्पष्ट किया कि सुप्रीम कोर्ट ने भी पहले ऐसे मामलों में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया था।
केंद्रीय एजेंसियों पर सवाल याचिकाकर्ता के वकील कल्याण बनर्जी ने आयोग की निष्पक्षता पर सवालिया निशान लगाते हुए पूछा, “सिर्फ राज्य के अधिकारियों को ही क्यों निशाना बनाया जा रहा है? बीएसएफ (BSF) या सीआईएसएफ (CISF) के महानिदेशकों का तबादला क्यों नहीं किया गया?” उन्होंने तर्क दिया कि चुनाव संचालन की जिम्मेदारी मुख्य सचिव की नहीं होती, बल्कि उनका काम पूरे राज्य का प्रशासन संभालना है। वहीं, राज्य के एडवोकेट जनरल किशोर दत्त ने संवैधानिक प्रावधानों का हवाला देते हुए आयोग की शक्तियों पर बहस की।
सोमवार को सौंपी जाएगी रिपोर्ट हाईकोर्ट ने चुनाव आयोग को निर्देश दिया है कि वह इन तबादलों से संबंधित सभी दस्तावेज आगामी सोमवार तक अदालत में जमा करें। इन दस्तावेजों की समीक्षा के बाद ही अदालत अपना अंतिम फैसला सुनाएगी। ममता बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस लगातार इन तबादलों को भाजपा की साजिश करार दे रही हैं। अब सबकी निगाहें सोमवार को जमा होने वाले दस्तावेजों और कोर्ट के अगले कदम पर टिकी हैं।