स्मार्टफोन के दौर में सिमटा फुटबॉल का जुनून? कोलकाता की सड़कों पर अब नहीं दिखती डर्बी वाली वो भीड़

किसी समय कोलकाता का मैदान भारतीय फुटबॉल का मक्का कहा जाता था। ईस्ट बंगाल, मोहन बागान और मोहम्मडन जैसे बड़े क्लबों के मैचों में दर्शकों का सैलाब उमड़ पड़ता था। लेकिन आज हकीकत कुछ और है। हाल के वर्षों में, विशेष रूप से 2023-24 और उसके बाद के सत्रों में, स्थानीय लीगों में दर्शकों की औसत संख्या घटकर महज 5 से 10 हजार रह गई है।
क्या हैं प्रमुख कारण? जानकारों का मानना है कि आईएसएल (ISL) की चमक-धमक ने स्थानीय लीगों के महत्व को कम कर दिया है। इसके अलावा, डिजिटल युग का प्रभाव भी साफ दिख रहा है। एक सर्वे के मुताबिक, कोलकाता के 60% युवा अब मैदान जाने के बजाय मोबाइल पर मैच देखना पसंद करते हैं। मैदानों में बुनियादी सुविधाओं जैसे साफ शौचालय, बैठने की उचित व्यवस्था और सुरक्षा की कमी भी परिवारों को स्टेडियम से दूर कर रही है।
बदलाव की जरूरत: विशेषज्ञों का कहना है कि अगर मैदान के फुटबॉल की विरासत को बचाना है, तो बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर और स्थानीय लीग के स्तर को सुधारना होगा। अगर क्लबों के प्रदर्शन में निरंतरता नहीं आती और मार्केटिंग पर ध्यान नहीं दिया गया, तो कोलकाता फुटबॉल का वो सुनहरा दौर केवल यादों में रह जाएगा।