उत्तर बंगाल में कमल तो दक्षिण में ‘जोड़ा फूल’—नबन्ना की लड़ाई में किसका पलड़ा भारी?

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के लिए सियासी पारा अपने चरम पर है। ममता बनर्जी के अभेद्य माने जाने वाले गढ़ में सेंध लगाने के लिए भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने इस बार अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। पिछले चुनावों के आंकड़ों और वर्तमान ‘वोटर लिस्ट विवाद’ (SIR) ने इस बार की लड़ाई को काफी रोचक बना दिया है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि क्या भ्रष्टाचार और बेरोजगारी जैसे मुद्दों को लेकर सरकार विरोधी लहर (Anti-incumbency) ममता बनर्जी के किले को कमजोर कर पाएगी?

आंकड़ों का खेल और रणनीतिक दांव बीजेपी के लिए इस बार सबसे बड़ी उम्मीद उत्तर बंगाल और जंगलमहल के इलाके हैं, जहां उनका वोट बैंक स्थिर रहा है। हालांकि, तृणमूल कांग्रेस (TMC) का दावा है कि उनके पास 114 ऐसी सीटें हैं जहां उनकी जीत का अंतर 10% से अधिक है। बीजेपी इस बार किसी मुख्यमंत्री चेहरे के बजाय ‘विकास पुरुष’ नरेंद्र मोदी के नाम पर वोट मांग रही है। वहीं, ममता बनर्जी ने ‘बंगाली अस्मिता’ और ‘SIR’ के कारण वोटर लिस्ट से कटे 60 लाख नामों को बड़ा मुद्दा बना दिया है। उनका आरोप है कि यह बीजेपी की साजिश है, जिसका जवाब जनता वोट से देगी।

तृणमूल की जवाबी रणनीति दूसरी तरफ, टीएमसी ने अपनी पकड़ मजबूत रखने के लिए ‘लक्ष्मी भंडार’ जैसी कल्याणकारी योजनाओं और सांप्रदायिक सद्भाव को अपना मुख्य हथियार बनाया है। भवानीपुर जैसे विविधतापूर्ण क्षेत्रों में ममता बनर्जी सर्वधर्म सद्भाव का संदेश देकर गैर-बंगाली मतदाताओं को भी साधने की कोशिश कर रही हैं। बीजेपी जहां ग्रामीण क्षेत्रों में घुसपैठ कर रही है, वहीं कोलकाता और आसपास के शहरी इलाकों में ममता का जादू बरकरार दिख रहा है। 2026 की यह चुनावी जंग केवल सत्ता की नहीं, बल्कि अस्मिता और अस्तित्व की लड़ाई बन चुकी है।

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