ईरान अमेरिका संघर्षविराम में पाकिस्तान की मध्यस्थता पर जयराम रमेश का पीएम मोदी पर तीखा हमला

अमेरिका और ईरान के बीच हाल ही में घोषित 14 दिनों के संघर्षविराम ने भारतीय राजनीति में एक नया विवाद खड़ा कर दिया है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और सांसद जयराम रमेश ने इस पूरे घटनाक्रम को केंद्र सरकार की कूटनीतिक विफलता बताया है। उन्होंने विशेष रूप से पाकिस्तान द्वारा इस समझौते में निभाई गई मध्यस्थ की भूमिका पर सवाल उठाते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश नीति पर कड़ा प्रहार किया है।
मध्यस्थता की भूमिका और अमेरिका ईरान समझौता
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई को 14 दिनों के लिए रोकने की घोषणा की है। इस समझौते के तहत अमेरिका ने ईरान के 10-सूत्रीय शांति प्रस्ताव को स्वीकार किया है, जिसके बदले में ईरान ने ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ के माध्यम से सुरक्षित समुद्री मार्ग सुनिश्चित करने का भरोसा दिया है। गौर करने वाली बात यह है कि इस महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय वार्ता की मेजबानी और मध्यस्थता पाकिस्तान ने की है, जिसे जयराम रमेश ने भारत के लिए एक कूटनीतिक झटका बताया है।
जयराम रमेश के सरकार से तीखे सवाल
कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने सोशल मीडिया के माध्यम से मोदी सरकार की ‘व्यक्तिगत कूटनीति’ पर कई गंभीर आरोप लगाए हैं:
- कूटनीतिक विफलता: रमेश का तर्क है कि पाकिस्तान को वैश्विक स्तर पर अलग-थलग करने और उसे एक ‘विफल राष्ट्र’ घोषित करने की भारत की रणनीति विफल रही है।
- पश्चिम एशिया पर रुख: उन्होंने सवाल किया कि 28 फरवरी को जब ईरान के शीर्ष नेतृत्व को निशाना बनाया गया, तब भारत सरकार चुप क्यों रही? उनके अनुसार, पीएम मोदी की इजरायल यात्रा ने भारत की तटस्थ छवि को प्रभावित किया है।
- ऑपरेशन सिंदूर पर स्पष्टीकरण: उन्होंने 10 मई 2025 को ‘ऑपरेशन सिंदूर’ को अचानक रोके जाने पर भी सवाल उठाए और सरकार से इसके पीछे के कारणों की मांग की।
- विदेश मंत्रालय की आलोचना: रमेश ने विदेश मंत्री एस. जयशंकर के पुराने बयानों का हवाला देते हुए निशाना साधा, जिसमें उन्होंने पाकिस्तान की अंतरराष्ट्रीय प्रासंगिकता को खारिज किया था।
अंतरराष्ट्रीय हलचल और विशेषज्ञों की राय
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने इस मध्यस्थता को अपनी एक बड़ी कूटनीतिक जीत करार दिया है। उन्होंने दोनों देशों के प्रतिनिधियों को 10 अप्रैल 2026 को इस्लामाबाद में स्थायी शांति वार्ता के लिए आमंत्रित किया है। हालांकि, अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ इस घटनाक्रम को संदेह की दृष्टि से देख रहे हैं। अमेरिकी थिंक टैंक ‘फाउंडेशन फॉर डिफेंस ऑफ डेमोक्रेसीज’ के जोनाथन शेंजर ने इसे ‘अजीब’ बताते हुए अंदेशा जताया है कि कर्ज में डूबा पाकिस्तान शायद चीन के इशारे पर यह भूमिका निभा रहा है।
एक झलक
- घटना: अमेरिका और ईरान के बीच 14 दिनों का युद्धविराम समझौता हुआ।
- पाकिस्तान की भूमिका: पाकिस्तान ने इस शांति समझौते में मुख्य मध्यस्थ और मेजबान के रूप में काम किया।
- विपक्ष का हमला: जयराम रमेश ने इसे पीएम मोदी की विदेश नीति की हार और पाकिस्तान को अलग-थलग करने की नीति की विफलता बताया।
- प्रमुख मांग: कांग्रेस ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ को रोके जाने और पश्चिम एशिया संकट पर भारत की चुप्पी पर स्पष्टीकरण मांगा है।
- अगला कदम: 10 अप्रैल 2026 को इस्लामाबाद में स्थायी शांति के लिए अगली बैठक प्रस्तावित है।