US-Iran संघर्ष विराम पर ओवैसी का पीएम मोदी पर प्रहार पाकिस्तान की भूमिका ने भारत की कूटनीति पर खड़े किए सवाल

अमेरिका और ईरान के बीच 40 दिनों से जारी तनावपूर्ण गतिरोध के बाद हुए दो सप्ताह के संघर्ष विराम ने वैश्विक राजनीति में हलचल मचा दी है। इस कूटनीतिक घटनाक्रम पर भारत के भीतर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हो गया है। एआईएमआईएम (AIMIM) प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने इस समझौते में पाकिस्तान की मध्यस्थता को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला है। ओवैसी का तर्क है कि जो कूटनीतिक सफलता भारत को हासिल करनी चाहिए थी, वह अवसर एक ऐसे देश के पास चला गया जो आतंकवाद के लिए कुख्यात है।
कूटनीतिक विफलता का आरोप और क्षेत्रीय समीकरण
असदुद्दीन ओवैसी ने मोदी सरकार की विदेश नीति पर सवाल उठाते हुए कहा कि ईरान के साथ भारत के ऐतिहासिक और करीबी संबंध रहे हैं। इसके बावजूद संघर्ष विराम सुनिश्चित करने में भारत कोई प्रभावी भूमिका नहीं निभा सका। ओवैसी के अनुसार, यह भारत के लिए दुखद है कि उसके पड़ोसी देश पाकिस्तान ने इस संकट को सुलझाने में मध्यस्थ की भूमिका निभाई। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि भाजपा सरकार देश के नागरिकों को केवल ‘तीन घंटे की फिल्म’ जैसा तमाशा दिखाकर खुश करने की कोशिश कर रही है, जबकि वास्तविक अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में देश पिछड़ रहा है।
जम्मू-कश्मीर के नेताओं की प्रतिक्रिया और विश्लेषण
इस संघर्ष विराम का असर जम्मू-कश्मीर की राजनीति पर भी स्पष्ट रूप से देखा जा रहा है। वहां के प्रमुख नेताओं ने इस समझौते पर अलग-अलग दृष्टिकोण साझा किए हैं:
- महबूबा मुफ्ती का पाकिस्तान प्रेम: पीडीपी प्रमुख महबूबा मुफ्ती ने पाकिस्तान द्वारा निभाई गई मध्यस्थता की सराहना की और इसे दुनिया को बचाने वाला कदम बताया। उन्होंने ईरान के संयम की तारीफ करते हुए आरोप लगाया कि अमेरिका और इजरायल ने ईरान में नागरिक ठिकानों को निशाना बनाया था।
- फारूक अब्दुल्ला की शांति अपील: नेशनल कॉन्फ्रेंस के वरिष्ठ नेता फारूक अब्दुल्ला ने बातचीत को ही एकमात्र समाधान बताया। उन्होंने भारत से अपील की कि भविष्य में ऐसी स्थितियों में मध्यस्थता के लिए आगे आना चाहिए क्योंकि पश्चिम एशिया का तनाव वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को सीधे प्रभावित करता है।
- उमर अब्दुल्ला का रणनीतिक सवाल: मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने इस युद्ध की सार्थकता पर ही सवाल उठा दिए। उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा कि 40 दिनों के संघर्ष के बाद भी अमेरिका को कुछ हासिल नहीं हुआ, क्योंकि होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) की स्थिति युद्ध से पहले जैसी ही बनी हुई है।
संघर्ष विराम का वैश्विक प्रभाव
यह समझौता ऐसे समय में हुआ है जब पूरी दुनिया परमाणु युद्ध की आशंका और तेल की कीमतों में भारी उछाल से डरी हुई थी। होर्मुज जलडमरूमध्य का फिर से खुलना वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए राहत की बात है, लेकिन भारत के भीतर इस मुद्दे पर हो रही राजनीति ने विदेश नीति की प्राथमिकताओं पर नई बहस छेड़ दी है।
एक झलक
- विवाद का केंद्र: अमेरिका और ईरान के बीच दो सप्ताह का संघर्ष विराम।
- ओवैसी का हमला: पाकिस्तान की मध्यस्थता को भारत की कूटनीतिक हार बताया।
- कश्मीर का रुख: महबूबा मुफ्ती ने पाकिस्तान और ईरान के रुख की सराहना की।
- उमर अब्दुल्ला का तर्क: युद्ध को ‘अन्यायपूर्ण’ बताते हुए अमेरिका की उपलब्धि पर सवाल उठाए।
- मुख्य चिंता: होर्मुज जलडमरूमध्य के जरिए होने वाली वैश्विक तेल आपूर्ति।