अब UCC लागू करने का वक्त आ गया’ मुस्लिम पर्सनल लॉ vs पॉक्सो एक्ट टकराव पर दिल्ली हाईकोर्ट की बड़ी टिप्पणी, संसद को दिया स्पष्ट संदेश

दिल्ली हाईकोर्ट ने एक अहम जमानत याचिका पर सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया है कि अब संसद को यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC) पर फैसला लेना चाहिए। जस्टिस अरुण मोंगा ने कहा कि अलग-अलग व्यक्तिगत कानून और राष्ट्रीय कानून के बीच टकराव लोगों को अपराधी बना देता है, जबकि वे अपने धार्मिक या परंपरागत नियमों का पालन कर रहे होते हैं। कोर्ट ने कहा कि अब वक्त आ गया है जब UCC लागू करने पर विचार किया जाए ताकि व्यक्तिगत या धार्मिक कानून राष्ट्रीय कानून से ऊपर न ठहरें।

क्या है पूरा मामला?

यह टिप्पणी हामिद रज़ा नामक युवक के केस में आई, जिसे एक नाबालिग लड़की से शादी और शारीरिक संबंध बनाने के आरोप में जेल भेजा गया था। आरोप लड़की के सौतेले पिता ने लगाया था। लेकिन लड़की ने अदालत में बयान दिया कि वह वयस्क (करीब 20 वर्ष) है और उसने अपनी मर्जी से इस्लामी कानून के तहत वैध निकाह किया और उनका एक बच्चा भी हुआ। लड़की ने पति को रिहा करने की गुहार लगाई।

सौतेले पिता का शोषण और कानूनी प्रक्रिया में गड़बड़ी

अदालत ने यह भी पाया कि एफआईआर दर्ज कराने का मकसद सौतेले पिता का खुद के यौन शोषण के अपराधों को छिपाना था, क्योंकि पीड़िता ने कोर्ट में बताया कि वही सौतेला पिता उसका शोषण करता था। कोर्ट ने माना कि आरोपी की गिरफ्तारी और हिरासत में भी कानूनी प्रक्रिया का सही से पालन नहीं किया गया था, जिसे अदालत ने गंभीर उल्लंघन माना।

कोर्ट का बड़ा कानूनी सवाल और फैसला

दिल्ली हाईकोर्ट के सामने मुख्य सवाल यह था कि मुस्लिम पर्सनल लॉ (जिसके तहत 15 साल की उम्र में शादी मान्य हो सकती है) के तहत हुई शादी को मान्यता दी जाए या भारतीय दंड संहिता (बीएनएस) और पॉक्सो एक्ट (जिसमें 18 साल से कम उम्र में संबंध अपराध है) के नियम लागू किए जाएं। जस्टिस मोंगा ने आरोपी हामिद रज़ा को नियमित जमानत देने का आदेश दिया।

कोर्ट ने कहा कि यह विवाद अदालतों में बार-बार आता है, लेकिन असली समाधान संसद ही निकाल सकती है। जस्टिस मोंगा ने टिप्पणी की कि लंबे समय तक व्यक्तिगत कानून और राष्ट्रीय कानून के बीच टकराव समाज में अस्थिरता पैदा करेगा और स्थायी समाधान केवल स्पष्ट और समान कानून से ही संभव है।

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