हादसों पर क्यों नहीं लग रही लगाम? महाकुंभ से मंदिर तक, बार-बार क्यों मचती है भगदड़ और क्यों नहीं मिलती सज़ा?

तमिलनाडु के करूर में अभिनेता और नेता थलापति विजय की रैली में मची भगदड़ ने एक बड़ा हादसा कर दिया है, जिसमें 39 लोगों की मौत हो गई है और दर्जनों लोग घायल हुए हैं। 51 लोग अभी भी अस्पताल में भर्ती हैं। यह घटना उत्साह के पल को मातम में बदल गई है।

चिंताजनक बात यह है कि 2025 की यह छठी बड़ी भगदड़ है। इससे पहले मंदिरों, रेलवे स्टेशनों और धार्मिक आयोजनों में हुई भगदड़ों ने उत्साह के माहौल को त्रासदी में बदल दिया है। इस साल 5 भगदड़ों में 71 लोगों की जान जा चुकी है।

बार-बार भगदड़ की मुख्य वजहें: विशेषज्ञों के अनुसार, पहले से आयोजित कार्यक्रमों में भगदड़ की सबसे बड़ी वजह भीड़ का सही आकलन न कर पाना है। आयोजकों ने भले ही 10,000 लोगों की अनुमति मांगी थी, लेकिन करूर की रैली में आधिकारिक तौर पर 27,000 और प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार करीब एक लाख लोग जुटे थे। भीड़ बढ़ने से सभी सुरक्षा और व्यवस्था के इंतजाम धरे रह जाते हैं और स्थानीय प्रशासन स्थिति को संभालने में विफल रहता है।

जवाबदेही तय नहीं, सजा भी नहीं: हर भगदड़ के बाद जांच आयोग गठित होता है, लेकिन इसका कोई ठोस नतीजा नहीं निकलता है। किसी भी बड़ी भगदड़ के मामले में अभी तक कोई अहम सजा नहीं हुई है। अक्सर मानवीय कारणों को वजह बताकर जांच खत्म कर दी जाती है। सजा के नाम पर निचले स्तर के अधिकारियों या पुलिस कर्मियों पर दोष मढ़ दिया जाता है, जबकि बड़े पदों पर बैठे लोग और आयोजक आसानी से बच निकलते हैं।

हादसे रोकने के लिए जरूरी सुधार: इस तरह के हादसों पर लगाम लगाने के लिए निम्नलिखित सुधारों की सख्त जरूरत है:

  • भीड़ प्रबंधन योजना: आयोजन से पहले भीड़ प्रबंधन की सख्त योजना बनाई जाए और इसके मानक तय हों।
  • संख्या निर्धारित करना: भीड़ की संख्या पहले से निर्धारित हो और इसकी निगरानी के लिए कैमरे और ड्रोन तैनात किए जाएं।
  • सुरक्षित निकास: पर्याप्त प्रवेश, निकास और आपातकालीन द्वार बनाए जाएं।
  • वैकल्पिक उपाय: भीड़ बढ़ने पर तुरंत वैकल्पिक उपाय लागू किए जाएं।
  • कठोर कानूनी कार्रवाई: हादसा होने पर मुख्य आयोजक, स्थानीय प्रशासनिक प्रमुख समेत सभी जिम्मेदारों पर सख्त कार्रवाई की जाए, न कि केवल औपचारिकता।

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