यहां दशहरे पर नहीं जलता रावण! चित्रकूट के इस गांव में 250 साल से होती है रावण की पूजा, वजह जानकर हो जाएंगे हैरान
जब पूरे देश में दशहरा पर्व पर जगह-जगह रावण दहन की तैयारियां होती हैं और बुराई पर अच्छाई की जीत का जश्न मनाया जाता है, उसी समय उत्तर प्रदेश के चित्रकूट का रैपुरा गांव अपनी एक अनोखी परंपरा से सबको चौंका देता है। यहां रावण के पुतले को जलाया नहीं जाता, बल्कि उसका पूजन और सम्मान किया जाता है।
ढाई सौ साल पुरानी रावण पूजा
रैपुरा गांव के बाहर मुख्य सड़क किनारे रावण की करीब ढाई सौ साल पुरानी प्रतिमा स्थापित है। दशहरे के दिन सुबह-सुबह ग्रामीण इस प्रतिमा पर फूल चढ़ाते हैं, नारियल फोड़ते हैं और विधि-विधान से उसकी पूजा करते हैं। शाम को यहां भव्य रामलीला का आयोजन भी होता है, लेकिन खास बात यह है कि प्रतिमा को कभी भी दहन नहीं किया जाता।
ब्राह्मण और शिवभक्त मानते हैं ग्रामीण
गांव के लोग मानते हैं कि रावण सिर्फ राक्षस नहीं, बल्कि एक महान पंडित, ब्राह्मण और शिव का अनन्य भक्त था। उसने वेद-पुराणों का गहन अध्ययन किया और विद्या के क्षेत्र में अतुलनीय योगदान दिया। ग्रामीणों का विश्वास है कि रावण की अच्छाइयों की पूजा करने से गांव में ज्ञान, शांति और समृद्धि बनी रहती है।
रावण का आशीर्वाद दिलाता है सफलता
स्थानीय लोगों का दावा है कि रावण की प्रतिमा स्थापित होने के बाद से गांव में समृद्धि आई है। यहां के कई युवक आईएएस, पीसीएस और अन्य सरकारी पदों पर कार्यरत हैं। ग्रामीण इसे रावण के आशीर्वाद का ही नतीजा मानते हैं और विश्वास करते हैं कि उनकी पूजा से शिक्षा और सफलता का मार्ग प्रशस्त होता है।