अंकगणित में फेल तेजस्वी का दावा: 2.35 करोड़ नौकरियों के लिए सालाना 4.6 लाख करोड़ का वेतन बिल, कैसे होगा भुगतान?
राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के नेता और बिहार के पूर्व उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव के वादे पर सवाल खड़ा होना लाजिमी है। क्योंकि उन्होंने गुरुवार को अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में इंडिया गठबंधन की सरकार बनने पर, ‘प्रत्येक बिहारी परिवार के लिए एक सरकारी नौकरी’ का वादा किया था। इस वादे को पूरा करने का मतलब बिहार के राजकोष में सेंध लगाना है। हालांकि, यह आगामी चुनाव से प्रेरित एक सोची-समझी और नपी-तुली राजनीति जैसा लग रहा है।
न्यूज18 द्वारा प्राप्त आधिकारिक आंकड़ों और दस्तावेजों का गहन विश्लेषण, जिसमें बिहार का राज्य बजट, इसकी रेवेन्यू जेनरेशन क्षमता, सीएजी रिपोर्ट (मार्च 2025), नए नीति आयोग मूल्यांकन रिपोर्ट, साथ ही सरकार की जाति जनगणना रिपोर्ट शामिल है, से पता चलता है कि यादव का चुनाव पूर्व वादा केवल एक दिखावटी वादा है, जिसका अंकगणित हकीकत से मिलते ही ध्वस्त हो जाता है।
राज्य-स्तरीय अनुमानों के अनुसार, बिहार की जनसंख्या लगभग 127 मिलियन (2025 अनुमान) और राज्य का औसत घरेलू आकार लगभग 5.4 मिलियन है, जिसका अर्थ है लगभग 2.35 करोड़ परिवार। वर्तमान में, बिहार जाति सर्वेक्षण के अनुसार, लगभग 20.5 लाख लोग सरकारी नौकरी में हैं। यह उन सरकारी कर्मचारियों का कार्यबल है जिन पर राज्य पहले से ही अपना कोष खर्च करता है।
वादे का टारगेट प्रति परिवार एक नौकरी है। इसके अनुसार राज्य को 2.35 करोड़ नौकरियों के लिए सैलरी देना होगा। 20 लाख मौजूदा नौकरियों को हटा दें तो राज्य को 2.15 करोड़ नई नौकरियां पैदा करने की जरूरत है।
बिहार के खातों की जांच करने पर, राज्य का वेतन या मजदूरी पर वार्षिक खर्च 45,000 करोड़ रुपये से अधिक दिखाई देता है। यानी आज प्रति सरकारी कर्मचारी औसत वार्षिक वेतन लागत लगभग 2.2 लाख रुपये है। इस अनुमानित गणना के अनुसार, प्रत्येक बिहारी परिवार को एक सरकारी नौकरी देने का वादा आर्थिक रूप से बेतुका लगता है।
तेजस्वी वास्तव में 2.15 करोड़ अतिरिक्त सरकारी नौकरियां पैदा करने का वादा कर रहे हैं, जो मौजूदा कार्यबल से दस गुना ज़्यादा है। निवर्तमान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के 12 लाख नौकरियों के पहले के आश्वासन को भी अवास्तविक बताया गया था।
2025-26 के बजट में बिहार के लगभग 20 लाख कर्मचारियों के वेतन और मजदूरी पर लगभग 40,000 से 50,000 करोड़ रुपये का खर्च आने का अनुमान है। तेजस्वी के वादे के तहत 2.15 करोड़ नए कर्मचारियों की मांग से गुणा करें, तो यह आंकड़ा सालाना लगभग 4.6 लाख करोड़ रुपये बैठता है।
बिहार बजट 2024-25 के वार्षिक वित्तीय विवरण के अनुसार, राज्य द्वारा प्रतिबद्ध व्यय पर 92,882 करोड़ रुपये खर्च किए जाने का अनुमान है, जो उसकी अनुमानित राजस्व प्राप्तियों का 41% है। 2025-26 के लिए बिहार का कुल राजस्व व्यय, जिसमें वेतन, पेंशन, स्वास्थ्य, शिक्षा, बुनियादी ढांचा और कल्याण शामिल हैं, लगभग 2.5 लाख करोड़ रुपये है। अकेले प्रस्तावित वेतन बिल ही राज्य के पूरे बजट का लगभग दोगुना होगा।
कैग (मार्च 2025) की रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि बिहार की 70% से ज़्यादा राजस्व प्राप्तियां वेतन, पेंशन और ब्याज भुगतान में चली जाती हैं।
नीति आयोग ने बिहार को प्रति व्यक्ति आय के मामले में सबसे निचले पायदान पर रखा है, जिससे पता चलता है कि नए राजकोषीय बोझ के लिए कितनी कम गुंजाइश बची है। रिपोर्ट में कहा गया है कि, “बिहार का वास्तविक जीएसडीपी 2012-13 और 2021-22 के बीच औसतन 5.0 प्रतिशत की दर से बढ़ा, जो राष्ट्रीय औसत वृद्धि दर 5.6 प्रतिशत से कम है। 2021-22 में इसकी प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय प्रति व्यक्ति आय का केवल 30 प्रतिशत थी।”
तेजस्वी का ऐलान वाहवाही बटोरने के लिए है, ऑडिट के लिए नहीं। यह लोकलुभावनवाद के भेष में छिपी महत्वाकांक्षा की दरिद्रता है, जहां राजनीति ऐसे वादे करती है जिन्हें अर्थशास्त्र पूरा नहीं कर सकता।