बिग साइंटिफिक ब्रेकथ्रू, कैंसर-अल्जाइमर के रहस्य से उठा पर्दा! इजरायली वैज्ञानिकों ने खोजा सेल का ‘सीक्रेट गेट’।

मानव कोशिकाओं के केंद्रक (Cell’s Nucleus) में क्या प्रवेश करेगा और क्या बाहर निकलेगा, यह प्रक्रिया कैसे नियंत्रित होती है— यह रहस्य दशकों से शोधकर्ताओं के लिए एक पहेली बना हुआ था। हाल ही में, इजरायली और अमेरिकी वैज्ञानिकों की एक टीम ने इस गुत्थी को सुलझा लिया है, जिससे कैंसर, अल्जाइमर और एएलएस (ALS) जैसी बीमारियों के इलाज पर नई रोशनी पड़ सकती है। हिब्रू यूनिवर्सिटी ऑफ जेरूसलम ने इस महत्वपूर्ण खोज की घोषणा की।

हिब्रू यूनिवर्सिटी, यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफ़ोर्निया (UCSF), रॉकफेलर यूनिवर्सिटी और अल्बर्ट आइंस्टीन कॉलेज ऑफ मेडिसिन के शोधकर्ताओं ने पाया कि ये नन्हे ‘गेटवे’ एक लचीले प्रोटीन नेटवर्क और विशेष आणविक ‘पासपोर्ट’ का उपयोग करके अणुओं को जल्दी और सटीकता से स्थानांतरित करते हैं।

कैसे काम करता है यह ‘न्यूक्लियर सिक्योरिटी चेकपॉइंट’?

इन गेटवे को न्यूक्लियर पोर कॉम्प्लेक्स (NPCs) कहा जाता है। प्रत्येक NPC मानव बाल की चौड़ाई के लगभग पांच-सौवें हिस्से जितना छोटा होता है— यह न्यूक्लियस के अंदर और बाहर के सभी आवागमन को नियंत्रित करता है।

अध्ययन के मुख्य लेखक, हिब्रू यूनिवर्सिटी के डॉ. बराक रावहे ने बताया, “NPCs छोटे, अत्यधिक परिष्कृत सुरक्षा चौकियों की तरह हैं। यह हर मिनट लाखों अणुओं को गुजरने देता है, फिर भी गलत अणुओं को बाहर रखता है— वह भी उल्लेखनीय सटीकता के साथ।”

वैज्ञानिकों ने कंप्यूटर सिमुलेशन के माध्यम से एक ‘वर्चुअल माइक्रोस्कोप’ बनाया। नए मॉडल से पता चला कि NPC के अंदर ‘FG रिपीट’ नामक प्रोटीन श्रृंखलाओं का एक सघन, लगातार चलने वाला ‘जंगल’ है। यह भीड़ भरा वातावरण स्वाभाविक रूप से छोटे अणुओं को छोड़कर, बिना एस्कॉर्ट वाले अणुओं को ब्लॉक कर देता है।

‘आणविक पासपोर्ट’ वाले ही अंदर

हालांकि, बड़े अणु तब भी गुजर सकते हैं जब वे न्यूक्लियर ट्रांसपोर्ट रिसेप्टर्स नामक आणविक ‘पासपोर्ट’ के साथ हों। रॉकफेलर यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर माइकल राउट ने कहा, “यह परिवहन एक पुल पर लगातार शिफ्ट होने वाले नृत्य की तरह काम करता है। केवल वे ही जो सही भागीदार— यानी रिसेप्टर्स— को ले जा रहे हैं, वे गुजर सकते हैं।

यह खोज कोशिका के आणविक यातायात को नियंत्रित करने के तरीके की पहली स्पष्ट व्याख्या प्रदान करती है। अल्बर्ट आइंस्टीन कॉलेज ऑफ मेडिसिन के प्रोफेसर डेविड कॉबर्न ने कहा कि इस खोज का ALS, अल्जाइमर और कैंसर जैसी बीमारियों को समझने में सीधा प्रभाव पड़ेगा। वैज्ञानिक अब इस ज्ञान का उपयोग करके ऐसी दवाएं डिजाइन कर सकते हैं जो सीधे न्यूक्लियस तक उपचार पहुंचाए।

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