उत्तर और पूर्वी भारत की रीतियाँ: कैसे यह पर्व रिश्तों की गहराई और मानवीय मूल्यों का उत्सव है?
भैया दूज भारतीय संस्कृति का एक महत्वपूर्ण पर्व है, जो भाई-बहन के स्नेह, प्रेम और अटूट विश्वास का प्रतीक है। यह पर्व दीपावली के दो दिन बाद कार्तिक शुक्ल द्वितीया को मनाया जाता है। इसे देश के विभिन्न भागों में भाई दूज, भाऊ बीज, यम द्वितीया या भ्रातृ द्वितीया के नाम से जाना जाता है।
अनुष्ठान और परंपरा
भैया दूज के दिन बहनें अपने भाइयों को:
- तिलक लगाती हैं।
- आरती उतारती हैं।
- उनके दीर्घ जीवन और सुख-समृद्धि की कामना करती हैं।
बदले में भाई बहनों को उपहार देते हैं और उनकी आजीवन रक्षा का वचन देते हैं। कई स्थानों पर इस दिन गंगा या यमुना नदी में स्नान करने की भी परंपरा है। यह दिन पारिवारिक संबंधों को और अधिक सुदृढ़ बनाता है।
सामाजिक और सांस्कृतिक संदेश
भैया दूज केवल एक पारिवारिक त्योहार नहीं, बल्कि भारतीय समाज में रिश्तों की गहराई और मानवीय मूल्यों का उत्सव है। यह पर्व हमें बताता है कि जीवन में स्नेह, सहयोग और एक-दूसरे की रक्षा की भावना कितनी आवश्यक है। यह त्योहार पारिवारिक संबंधों को सहेजने, प्रेम और एकता को बनाए रखने तथा एक-दूसरे के प्रति कर्तव्यनिष्ठ रहने की प्रेरणा देता है।
देश भर में उत्सव की विधि
भैया दूज का उत्सव पूरे भारत में मनाया जाता है, लेकिन इसके तरीकों में क्षेत्रीय अंतर है:
- उत्तर भारत: यहां बहनें भाई को अक्षत (चावल) व तिलक लगाकर नारियल देती हैं।
- पूर्वी भारत: यहां बहनें शंखनाद के बाद भाई को तिलक लगाती हैं और उपहार देती हैं।
पौराणिक मान्यताएं और यमुना स्नान
पौराणिक मान्यता है कि यदि संभव हो, तो भैया दूज के दिन भाई-बहन को अवश्य ही साथ यमुना स्नान करना चाहिए। इसके बाद भाई को बहन के यहां तिलक करवा कर ही भोजन करना चाहिए। यदि भाई उपस्थित न हो सके, तो बहन स्वयं चलकर भाई के यहां पहुंचे। बहन को चाहिए कि वह भाई को तिलक लगाने के बाद ही भोजन करे। यह माना जाता है कि यदि बहन सच्चे मन और पूरी श्रद्धा के साथ भाई के लिए प्रार्थना करे, तो वह जरूर फलीभूत होती है।
भैया दूज की कथा
भगवान सूर्यदेव की पत्नी का नाम छाया था। उनकी कोख से यमराज (मृत्यु के देवता) और यमुना का जन्म हुआ। यमुना अपने भाई यमराज से बहुत स्नेह करती थीं और उन्हें भोजन के लिए अपने घर आमंत्रित करती रहती थीं। यमराज अपनी व्यस्तता के कारण टाल जाते थे।
कार्तिक शुक्ल द्वितीया को यमुना ने फिर से यमराज को बुलाया। बहन के घर जाते समय यमराज ने नरक में निवास करने वाले जीवों को मुक्त कर दिया। भाई को देखते ही यमुना ने हर्ष−विभोर होकर उनका स्वागत-सत्कार किया तथा उन्हें भोजन करवाया।
इससे प्रसन्न होकर यमराज ने बहन से वर मांगने को कहा। बहन ने वर मांगा कि: “आप प्रतिवर्ष इस दिन मेरे यहां भोजन करने आया करें, तथा इस दिन जो बहन अपने भाई को टीका करके भोजन खिलाये, उसे आपका (यम का) भय न रहे।” यमराज ने ‘तथास्तु’ कहकर यमुना को अमूल्य वस्त्राभूषण दिए और यमपुरी चले गये। ऐसी मान्यता है कि जो भाई आज के दिन यमुना में स्नान करके पूरी श्रद्धा से बहनों के आतिथ्य को स्वीकार करते हैं, उन्हें यम का भय नहीं रहता।