‘तुझे जिंदा जलाऊंगा’: तैमूर लंग को ललकारने वाला वह हिंदू वीर जिसने मौत को हँसकर स्वीकारा, लेकिन कुदरत ने बचा लिया!
साल 1398, अक्टूबर का आखिरी हफ्ता। दिल्ली की ओर कूच करते क्रूर हमलावर तैमूर लंग की फौज को मेरठ किले का बहादुर कोतवाल आलाशर 41 दिनों तक आगे नहीं बढ़ने दे रहा था। यह तैमूर का पहली बार ऐसी सेना से सामना हो रहा था, जिसमें हाथी भी थे, जिनसे उसके सिपाही बेहद डरे हुए थे।
बादशाह को ललकार:
घबराए सिपाहियों को बचाने के लिए तैमूर ने सफेद झंडा फहराकर बातचीत की पेशकश की। किले की प्राचीर पर खड़े आलाशर ने जिरहबख्तर (कवच) में सजे तैमूर को ललकारते हुए पूछा, “तू कौन है?” जवाब में तैमूर ने खुद को “मावरा अलनहर, ईरान और बैन-उल-नहरीन का बादशाह” बताया और बिना लड़े अधीनता स्वीकार करने को कहा।
जब तैमूर ने धमकी दी, “तुझे एक लोहे के पिंजरे में बंद कर ईंधन के ढेर पर रख जिंदा जलाऊंगा।”
आलाशर हंसते हुए गरज उठे, “हम हिंदुओं को तो मरने के बाद जलना ही होता है। देश के लिए जिंदा जलेंगे तो मोक्ष (मुक्ति) मिलेगा।”
बारूद का वार और 41 दिन की जंग:
आलाशर ने स्पष्ट किया कि दिल्ली की सल्तनत के निजी झगड़ों से उसे कोई मतलब नहीं है, लेकिन देश पर बाहरी दुश्मन का कब्ज़ा वह होने नहीं देगा। आलाशर और उनके 8 हज़ार सैनिक मर-मिटने को तैयार थे।
किले से बरसते पत्थरों से परेशान तैमूर ने सामने की लड़ाई के बजाय धोखे का सहारा लिया। उसने किले की दीवार तक एक सुरंग खोदवाई, जिसमें बारूद भर दिया गया। उस समय हिंदुस्तानी सैनिक बारूद की ताकत से पूरी तरह अनजान थे।
जब कुदरत ने की मदद:
23-24 अक्टूबर 1398 की सुबह तैमूर ने बारूद में आग लगाने का हुक्म दिया। भयानक धमाकों से किले की सुरक्षा ध्वस्त हो गई। आलाशर की सेना जब तक कुछ समझ पाती, तैमूर की फौज किले में दाखिल हो चुकी थी। दोपहर होते-होते तैमूर ने जंग जीत ली और आलाशर उसकी कैद में थे।
आलाशर को एक लोहे के पिंजरे में बंद कर ईंधन के ढेर पर रख दिया गया। तैमूर को उम्मीद थी कि वह दया की भीख मांगेगा। लेकिन आलाशर अभी भी निडर थे। उन्होंने कहा, “तैमूर, मैं तुमसे कह चुका था कि हम हिंदुओं को अंत में जलना ही होता है और अगर जिंदा जल जाएं तो स्वर्ग में दर्जा और ऊंचा हो जाता है।”
तैमूर ने आग लगाने का हुक्म दिया, लेकिन तभी एक चमत्कार हुआ। तैमूर ने अपनी आत्मकथा में लिखा, आग जब आलाशर के करीब पहुंच उसे लपेट में लेने वाली थी, तभी एक काला बादल तेज़ी से आया और मूसलाधार बारिश शुरू हो गई। बारिश से आग बुझ गई। तैमूर को लगा कि खुदा नहीं चाहता कि कैदी को जिंदा जलाया जाए। उसने आलाशर को रिहा तो नहीं किया, पर जिंदा जलाने के बजाय कैद में रखने का हुक्म दे दिया।