धनबाद में चलता-फिरता ‘हॉलर कारोबार’, पुराने कपड़ों को रुई में बदलकर रजाई-गद्दे बनाने का पारंपरिक धंधा आज भी हिट

धनबाद के जगजीवन नगर में इन दिनों एक अनोखा और पारंपरिक कारोबार तेजी से चर्चा में है। यहां पुराने कपड़ों से हॉलर मशीन के जरिए रूई (रुई) तैयार करने का काम किया जा रहा है। यह कार्य बिहार के मधेपुरा जिला के रहने वाले मुबारक और उनकी टीम द्वारा किया जा रहा है।

आधुनिक मशीनरी, मेहनत और कौशल की बदौलत ये लोग पूरे झारखंड-बिहार के गांवों, कस्बों और शहरों में घूम-घूमकर रजाई और गद्दे बनाने के इस पारंपरिक धंधे को आज भी जिंदा रखे हुए हैं।

फटे कपड़े से बनती है मुलायम रुई:

मुबारक बताते हैं कि उनका यह काम पूरे 12 महीने लगातार चलता है। पुराने कपड़ों को हॉलर मशीन में डालते ही कपड़े फटकर मुलायम रूई में तब्दील हो जाते हैं। इस ‘हॉलर रूई’ की कीमत 120 रुपये प्रति किलो है। लोगों के घर से पुराने कपड़े लेकर मौके पर ही रूई बनाकर दे दी जाती है। इससे न केवल पुराने कपड़े पुन: इस्तेमाल हो जाते हैं, बल्कि लोगों को कम लागत में रजाई और गद्दे भी तैयार मिल जाते हैं।

कारोबार की खासियत—मोबाइल यूनिट:

उनकी विशेषता यह है कि पूरी यूनिट चलती-फिरती (मोबाइल) है। टेंपो में जनरेटर और हॉलर मशीन फिट करके टीम गांव-गांव घूमती है। रजाई-गद्दा बनाने का यह मोबाइल सेटअप लोगों के लिए काफी सुविधाजनक है।

मुबारक बताते हैं कि 20 किलो रूई तैयार करने में जनरेटर से करीब 1 लीटर डीज़ल की खपत होती है। रोजाना उनके काम में लगभग 10 लीटर डीज़ल लगता है। इसके बावजूद, यह पारंपरिक पेशा आज भी पर्याप्त कमाई देता है और कई परिवारों का सहारा बना हुआ है।

मुबारक दावा करते हैं कि झारखंड और बिहार में करीब 30–40 ऐसे टेंपो लगातार घूमते रहते हैं। सिर्फ धनबाद जिले में ही लगभग 30 ऑटो इस काम में सक्रिय हैं। यह पारंपरिक कला आज के आधुनिक दौर में भी पुनर्चक्रण को बढ़ावा दे रही है और ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों को किफायती रजाई-गद्दे उपलब्ध करा रही है।

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