चाय की दुकान से चेतन्या ग्रुप तक, कोटा के गौरव तिवारी की प्रेरणादायक कहानी
बुंदेलखंड का एक शहर है कोटा। यहां से लालसोट को जोड़ने वाला पाटन रोड मेगा हाईवे है, जहां हर दिन हजारों वाहन गुजरते हैं। इसी हाईवे के किनारे सालों तक एक छोटी-सी चाय की दुकान अपनी मौजूदगी दर्ज कराती रही। यही वो दुकान थी जहां एक साधारण-सा युवक गौरव तिवारी अपने बड़े सपने उबाल रहा था।
गौरव किसी अमीर परिवार से नहीं थे। उनके पिता गौ सेवक थे—गायों की सेवा करके घर चलाने वाले। सरकारी नौकरी नहीं थी, लेकिन उन्होंने अपने बेटे को सबसे कीमती विरासत दी—ईमानदारी, मेहनत और लोगों की मदद करने की सीख। बारहवीं तक पढ़ाई के बाद गौरव ने चाय की दुकान संभाल ली। सुबह पाँच बजे चूल्हा जलता, दाल चीनी की खुशबू हवा में घुल जाती और उसी खुशबू के साथ उसके सपने भी परवान चढ़ते थे।
चाय की दुकान बनी बिजनेस स्कूल
लोग कहते थे कि गौरव की चाय में कुछ खास है। पर वे नहीं जानते थे कि उस चाय में सिर्फ स्वाद नहीं, उसकी जिद, संघर्ष और भविष्य की नींव भी घुली थी।
मोड़ तब आया जब कुछ ब्रोकर आए दिन उसकी चाय की थड़ी पर बैठकर जमीन की डीलों की बातें करने लगे—प्लॉटिंग, रजिस्ट्री, फार्महाउस, प्रोजेक्ट। गौरव चुपचाप सुनता, पर हर शब्द उसके दिल में जगह बना रहा था। एक दिन उसके मन में चिंगारी उठी—“अगर ये कर सकते हैं, तो मैं क्यों नहीं?” वह किसान का बेटा था। ज़मीन से रिश्ते और भाषा दोनों समझता था।
पैसे कम थे, पर हिम्मत बड़ी थी। उसने थोड़ी बचत जोड़ी, कुछ किसानों ने भरोसा किया, और बालाजी की कृपा से छोटा सा लोन मिला। इसी टोकन राशि से उसने पहला प्लॉट काटा। फिर पहला फार्महाउस प्लान बेचा। फिर दूसरा। लोग हैरान थे—फार्महाउस तो अमीरों का खेल, ये लड़का कैसे? लेकिन गौरव की सबसे बड़ी पूंजी थी—ईमानदारी। जैसे उसकी चाय में एक अलग स्वाद था, वैसे ही उसके काम में भी भरोसे का स्वाद था।
चेतन्या ग्रुप की धमाकेदार शुरुआत
जब गौरव ने पहला प्रोजेक्ट पूरा करवाया तो लोगों का भरोसा तेजी से बढ़ा। किसान भी उससे आसानी से जुड़ने लगे क्योंकि वह उनकी भाषा, उनकी जमीन और उनकी जरूरत को समझता था। KDA अप्रूव्ड प्लॉटिंग, UIT अप्रूव्ड प्लानिंग, CC रोड, नालियाँ, मंदिर और साफ सुथरा लेआउट देखकर लोग कहते—“गौरव तिवारी से मिल लो, वो घर दिलवा देगा।”
धीरे-धीरे चेतन्या ग्रुप का नाम कोटा और आसपास फैलने लगा। लोग यह देखकर और प्रभावित हुए कि बिना बड़े ऑफिस, बिना बड़े स्टाफ और बिना चमक-दमक के भी कोई सिर्फ भरोसे से काम कर सकता है। यही भरोसा उसकी पहचान बन गया और यही पहचान उसकी सबसे बड़ी पूंजी साबित हुई।
चाय की दुकान से हजारों परिवारों का घर
गौरव आज भी अपनी चाय की दुकान नहीं भूला है। वह कहता है—“जैसे चाय में पानी, चीनी और पत्ती का सही मिश्रण चाहिए, वैसे ही जमीन, ईमानदारी और लोगों की जरूरतों का सही मिलान चाहिए।” उसने न सिर्फ घर बनाए, बल्कि कई परिवारों की नींव भी मजबूत की। मोहन जी के चार बच्चों की पढ़ाई में मदद कर उन्हें संभाला। उसकी सोच साफ है—हर व्यक्ति को एक घर मिलना चाहिए, चाहे वह चाय बनाता हो या फार्महाउस खरीदता हो। आज चेतन्या ग्रुप पाँच से ज्यादा सफल योजनाएँ पूरी कर चुका है और सैकड़ों परिवार अपने घर का सपना पूरा कर चुके हैं। गौरव का सफर अभी भी जारी है और एक कप चाय से शुरू हुआ यह रास्ता अब हजारों लोगों की जीवन कहानी बन चुका है।