अफगानिस्तान के खनिज भंडार में भारत को प्रवेश का प्रस्ताव, भू-राजनीतिक मानचित्र पर मोदी सरकार की बड़ी रणनीतिक सफलता
युद्धग्रस्त अफगानिस्तान अब औपचारिक रूप से भारत को देश की विशाल, लेकिन लंबे समय से अप्रयुक्त खदानों में प्रवेश और निवेश का अवसर देने का प्रस्ताव दिया है। पेंटागन के शोध के अनुसार, अफगानिस्तान में लगभग 1 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक मूल्य का तांबा, लिथियम, सोना, लौह अयस्क और अन्य महत्वपूर्ण खनिज भंडार मौजूद है।
तालिबान शासन, असुरक्षा और तकनीकी अक्षमता के कारण अफगानिस्तान के 1,400 से अधिक खनन क्षेत्रों में जमा यह विशाल भंडार लंबे समय से अप्रयुक्त पड़ा था। भू-राजनीतिक वास्तविकता में भारत को यह अवसर देना अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में एक बड़ी रणनीतिक सफलता के रूप में देखा जा रहा है।
रणनीतिक और कूटनीतिक महत्व:
कूटनीतिक हलकों का मानना है कि अफगानिस्तान का यह निर्णय दक्षिण एशिया में भारत और चीन के बीच चल रही प्रतिस्पर्धा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। वर्तमान में, अफगानिस्तान में बुनियादी ढाँचे और खनन व्यवसाय में चीन की उपस्थिति बहुत प्रभावशाली है। ऐसे में भारत को खदानों के उपयोग का अवसर देकर काबुल का नया संदेश स्पष्ट है: वे दक्षिण एशिया में शक्ति संतुलन को पूरी तरह से चीन के हाथ में नहीं रहने देना चाहते।
विशेषज्ञों का दावा है कि यदि भारत इन खदानों में निवेश कर पाता है, तो देश के उद्योग, रक्षा और प्रौद्योगिकी क्षेत्रों को जबरदस्त लाभ मिलेगा। इलेक्ट्रिक वाहन, बैटरी, स्टील, निर्माण—सभी क्षेत्रों में भारत की बढ़ती माँग को पूरा करने के लिए यह खनिज भंडार एक बड़ा अवसर है।
भारत के बढ़ते प्रभाव का संकेत:
राजनीतिक विश्लेषकों का दावा है कि यह प्रस्ताव एक और महत्वपूर्ण संकेत देता है कि अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में भारत का प्रभाव और स्वीकार्यता कई गुना बढ़ गई है। कुछ साल पहले तक, अफगानिस्तान में रणनीतिक चर्चा या संसाधन तक पहुँच के मामले में भारत का नाम पहली पंक्ति में नहीं सुना जाता था। तालिबान सरकार की ओर से भारत के प्रति यह सकारात्मक दृष्टिकोण प्रधानमंत्री मोदी की कूटनीतिक और वैश्विक प्रभाव में वृद्धि का संकेत है।
अवसर के साथ बड़ी चुनौतियाँ:
हालाँकि, अवसर चाहे कितना भी बड़ा हो, भारत को सोच-समझकर फैसला लेना होगा। अफगानिस्तान की राजनीतिक स्थिरता और सुरक्षा स्थिति अभी भी अनिश्चित है। अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध, कर्मियों और बुनियादी ढाँचे का जोखिम—ये सभी भारत के बड़े निवेश को प्रभावित कर सकते हैं।
भविष्य: दिल्ली इस प्रस्ताव को कैसे स्वीकार करती है और कार्यान्वयन की दिशा में आगे बढ़ती है, इस पर सभी की निगाहें टिकी रहेंगी, क्योंकि यह निर्णय भारत के भविष्य के उद्योग, रक्षा और ऊर्जा शक्ति को दीर्घकालिक रूप से बदल सकता है।