मसूर दाल मांसाहारी है या शाकाहारी? असुर स्वरभानु के रक्त से उत्पत्ति या तामसिक गुण के कारण?
नई दिल्ली: मसूर दाल (Red Lentil) भारत में प्रोटीन के सबसे बड़े स्रोतों में से एक है। हालांकि, आपको यह जानकर आश्चर्य हो सकता है कि भारतीय समाज में एक ऐसा प्रचलित विश्वास है जिसके चलते कुछ साधु, ऋषि और पुजारी इस दाल को मांसाहारी या मांसाहार के समान मानते हैं और इसे छूने से भी मना करते हैं।
आइए जानते हैं कि लाल मसूर दाल के बारे में ऐसी भ्रांति क्यों फैली है।
१. पौराणिक विश्वास: असुर स्वरभानु का रक्त
हिंदू धर्मग्रंथों की एक प्रसिद्ध कहानी के अनुसार, जब समुद्र मंथन के दौरान अमृत निकला और देवताओं ने इसका वितरण शुरू किया, तो स्वरभानु नामक एक असुर गुप्त रूप से देवता का वेश बनाकर उनके साथ शामिल हो गया।
- भगवान विष्णु को यह पता चला और उन्होंने तुरंत अपने सुदर्शन चक्र से असुर का सिर काट दिया।
- यह माना जाता है कि स्वरभानु के रक्त की बूंदें जमीन पर गिरीं, जिससे मसूर दाल की उत्पत्ति हुई।
- खून से इस संबंध के कारण, कुछ परंपराएं मसूर दाल को मांसाहारी भोजन के बराबर मानती हैं।
२. धार्मिक कारण: दाल का तामसिक गुण
एक अन्य मान्यता यह है कि मसूर दाल में तामसिक गुण होते हैं।
- तामसिक गुण अंधकार, आलस्य और अशुद्धता से जुड़े होते हैं।
- इसलिए, जो लोग कठोर आध्यात्मिक जीवनशैली का पालन करते हैं, उनके लिए ये तामसिक खाद्य पदार्थ अनुपयुक्त माने जाते हैं क्योंकि ये मन को विचलित कर सकते हैं।
- ऋषि, साधु और पुरोहित आध्यात्मिक पवित्रता और एकाग्रता बनाए रखने के लिए मसूर दाल खाने से बचते हैं।
३. वैज्ञानिक और पोषण संबंधी दृष्टिकोण
- उच्च प्रोटीन: वैज्ञानिक रूप से, मसूर दाल प्रोटीन और फाइबर जैसे महत्वपूर्ण पोषक तत्वों से भरपूर होती है। कुछ लोग इसकी उच्च प्रोटीन सामग्री की तुलना मांस से करते हैं, जो इस गलत धारणा का कारण बन सकता है।
- वास्तविकता: वैज्ञानिक और पोषण की दृष्टि से, दालें फलियां (Legumes) हैं। इन्हें मांसाहारी नहीं माना जा सकता है।
निष्कर्ष: मसूर दाल खाना या न खाना पूरी तरह से व्यक्तिगत पसंद और धार्मिक मान्यताओं पर निर्भर करता है। पोषण के लिहाज से यह एक प्लांट-बेस्ड प्रोटीन है।