सत्ता का निर्णायक युद्ध! सेना प्रमुख मुनीर और शरीफ परिवार आमने-सामने, पाकिस्तान में सीधा सैन्य-राजनीतिक टकराव, समझौते के रास्ते बंद?

पाकिस्तान एक बार फिर बड़े राजनीतिक और सैन्य संकट के कगार पर खड़ा है। देश की सत्ता पर किसका नियंत्रण रहेगा—सेना या नागरिक सरकार का—इसे लेकर सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर और प्रभावशाली शरीफ परिवार के बीच सत्ता की अंतिम लड़ाई शुरू हो गई है। दोनों पक्षों ने अपनी शर्तें स्पष्ट कर दी हैं, और विश्लेषकों का मानना ​​है कि इन मांगों में समझौते की कोई गुंजाइश नहीं है, जिससे यह टकराव सबसे गंभीर चरण में पहुँच गया है।

मौजूदा हालात संकेत दे रहे हैं कि यह केवल ‘पद’ की लड़ाई नहीं है, बल्कि पाकिस्तान में असली शक्ति किसके पास रहेगी, इसका निर्णायक युद्ध है। सेना और राजनीति के बीच यह सीधा टकराव आने वाले महीनों में देश को अभूतपूर्व राजनीतिक और संवैधानिक संकट की ओर धकेल सकता है।

मुनीर की 4 कड़ी शर्तें:

सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर ने अपनी चार मांगें साफ कर दी हैं, जो पाकिस्तान की राजनीति को पूरी तरह से बदल सकती हैं: १. पाँच साल का कार्यकाल विस्तार: ‘स्थिरता’ और ‘नियंत्रण’ बनाए रखने के लिए वे पाँच साल तक सेना प्रमुख बने रहना चाहते हैं। २. पूरी रक्षा प्रणाली पर एकाधिकार: पाँच साल तक रक्षा प्रणाली पर उनका पूर्ण नियंत्रण हो, यानी कोई संयुक्त कमान नहीं होगी। ३. डिप्टी आर्मी चीफ नहीं: इसका मतलब है कि निर्णय केवल एक व्यक्ति लेगा—कोई प्रतिस्पर्धा या शक्ति साझाकरण नहीं होगा। ४. असीमित शक्ति: सूत्रों के अनुसार, इसमें राजनीतिक ढांचे को ‘पुनर्गठित’ करने की शक्ति भी शामिल है, जिससे राजनीति में सेना की भूमिका और बढ़ेगी।

शरीफ-जरदारी खेमे की 4 पलटवार मांगें:

शरीफ परिवार और जरदारी खेमे को आशंका है कि मुनीर को अतिरिक्त शक्ति देने से पाकिस्तान की नागरिक सरकार केवल नाममात्र की रह जाएगी। उनकी पलटवार शर्तें हैं: १. सिर्फ 2027 तक सेना प्रमुख: निर्धारित कार्यकाल से आगे कोई विस्तार नहीं चाहिए। २. दूसरे नेतृत्व का दावा: वे चाहते हैं कि रक्षा प्रतिष्ठान में एक दूसरा वरिष्ठ जनरल भी नेतृत्व साझा करे। ३. डिप्टी आर्मी चीफ की नियुक्ति: सेना में एक व्यक्ति के पूर्ण प्रभुत्व को समाप्त करने के लिए ‘चेक-बैलेंस’ मॉडल चाहते हैं। ४. सीमित शक्ति: उनकी स्पष्ट मांग है कि सेना को राजनीति में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।

विश्लेषकों का कहना है कि अगर दोनों पक्ष पीछे नहीं हटते हैं, तो यह लड़ाई पाकिस्तान को कमजोर नागरिक शासन और सेना बनाम राजनीतिक संस्थाओं के बीच एक खुले संघर्ष की ओर धकेल देगी। इस स्थिति में अब बड़ा सवाल यह है कि पाकिस्तान में अंतिम निर्णय लेने की शक्ति वास्तव में किसके हाथ में जाएगी?

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