‘लिव-इन’ पर मोहन भागवत का बड़ा बयान, ‘यह जिम्मेदारी से भागने का रास्ता है, संस्कार नहीं

आरएसएस के 100 साल पूरे होने के उपलक्ष्य में कोलकाता में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान संघ प्रमुख मोहन भागवत ने ‘लिव-इन रिलेशनशिप’ और देश की जनसंख्या स्थिति पर खुलकर अपनी राय रखी। भागवत ने आधुनिक जीवनशैली के इस हिस्से की आलोचना करते हुए कहा, “लिव-इन में रहने का सीधा मतलब है कि आप जिम्मेदारी लेने के लिए तैयार नहीं हैं। विवाह और परिवार केवल शारीरिक सुख के लिए नहीं, बल्कि समाज के निर्माण के लिए हैं।”
उन्होंने युवाओं को सलाह दी कि यदि वे पारिवारिक बंधनों में नहीं बंधना चाहते तो उन्हें संन्यासी बन जाना चाहिए, लेकिन बिना जिम्मेदारी के रहना अनुचित है। जनसंख्या के मुद्दे पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि यदि जन्मदर 2.1 से नीचे गिरती है, तो यह समाज के अस्तित्व के लिए खतरनाक संकेत है।
भागवत ने डॉक्टरों और मनोवैज्ञानिकों का हवाला देते हुए एक नया तर्क पेश किया। उन्होंने कहा, “चिकित्सकों का मानना है कि 19 से 25 वर्ष की आयु में विवाह और तीन बच्चे होने से माता-पिता और बच्चों का स्वास्थ्य बेहतर रहता है। वहीं मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, तीन बच्चे होने पर पति-पत्नी अपना अहंकार (Ego) नियंत्रित करना सीखते हैं।” उन्होंने समाज और धार्मिक परंपराओं की रक्षा के लिए पारिवारिक मूल्यों पर जोर दिया।