भारत-अमेरिका ट्रेड डील: क्या रूस से दोस्ती में आएगी दरार? मोदी की ‘बैलेंसिंग डिप्लोमेसी’ पर दुनिया की नजर!

भारत और अमेरिका के बीच हाल ही में संपन्न व्यापार समझौता वैश्विक राजनीति के पटल पर एक नई बहस को जन्म दे रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा भारतीय उत्पादों पर टैरिफ को 50% से घटाकर 18% करने की घोषणा के बाद सबसे बड़ा सवाल भारत और रूस के संबंधों पर उठ रहा है। ट्रम्प ने दावा किया है कि प्रधानमंत्री मोदी रूसी तेल की खरीद बंद करने और अमेरिका तथा वेनेजुएला से ऊर्जा आपूर्ति लेने पर सहमत हुए हैं। हालांकि, पीएम मोदी ने अपने संदेश में रूसी तेल का जिक्र न करते हुए बेहद सावधानी से अपनी बात रखी है।

जानकारों का मानना है कि भारत की विदेश नीति हमेशा से ‘राष्ट्रीय हित सर्वोपरि’ रही है। रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान भारत ने रूस से सस्ता तेल खरीदकर अपनी अर्थव्यवस्था को संभाला, लेकिन अब अमेरिका के साथ 500 अरब डॉलर के समझौते के जरिए वह अपनी ऊर्जा सुरक्षा को विविधता दे रहा है। रूस से तेल का आयात पहले ही तीन साल के निचले स्तर (लगभग 12 लाख बैरल प्रतिदिन) पर आ चुका है। ऐसे में अमेरिका से डील करना भारत के लिए आर्थिक और रणनीतिक दोनों लिहाज से एक बड़ी जीत है।

हालांकि, रूस के साथ भारत के रिश्ते केवल तेल तक सीमित नहीं हैं। रक्षा और अंतरिक्ष जैसे क्षेत्रों में रूस आज भी भारत का सबसे भरोसेमंद साझेदार है। दिसंबर 2025 में राष्ट्रपति पुतिन की भारत यात्रा के दौरान दोनों देशों ने अपने रिश्तों को ‘विशेषाधिकार प्राप्त रणनीतिक साझेदारी’ बताया था। इसलिए, तेल की खरीद में बदलाव का मतलब रूस से दूरी नहीं, बल्कि एक संतुलित कूटनीति है। भारत यह सुनिश्चित कर रहा है कि वह किसी एक धुरी पर निर्भर न रहकर वैश्विक मंच पर अपनी स्वायत्तता बनाए रखे।

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