कीड़े-मकौड़े खाकर तैयार होती है यह मुर्गी! छपरा के किसान ने खोजा कमाई का अनोखा तरीका, मुनाफा हुआ डबल
बिहार के छपरा जिले के किसान अब खेती के साथ-साथ मुर्गी पालन में नए प्रयोग कर रहे हैं। मांझी ब्लॉक के किसान मोहम्मद इसहाक अंसारी ने देसी नस्ल की मुर्गियों (सोनली और FFG-2) को पालकर अपनी किस्मत बदल ली है। उनका कहना है कि ये मुर्गियां खुद अपना खाना ढूंढ लेती हैं और इन्हें पालने का खर्च न के बराबर है।
देसी बनाम फार्मिंग: इसहाक अंसारी के अनुसार, पहले वे ‘उजला’ मुर्गी पालते थे, जिसमें दवा और दाने का खर्च बहुत ज्यादा था और बीमारियां भी अक्सर आती थीं। लेकिन सोनली और FFG-2 नस्लें बहुत मजबूत होती हैं। ये मुर्गियां खुले मैदान में घूमकर कीड़े-मकौड़े और खेतों के अवशेष खाती हैं, जिससे इनके मांस और अंडे की गुणवत्ता और कीमत दोनों बढ़ जाती है।
कमाई का गणित: सोनली नस्ल अंडे देने के लिए बेहतरीन है, जबकि FFG-2 नस्ल मांस के लिए जानी जाती है। मात्र 3 महीने में ये मुर्गियां 2.5 से 3 किलो तक वजन हासिल कर लेती हैं। कम लागत और ज्यादा मांग के कारण इसहाक अंसारी अब अन्य किसानों के लिए भी प्रेरणा बन गए हैं।