बंगाल की राजनीति के ‘चाणक्य’ मुकुल रॉय का निधन, सत्ता और विपक्ष में शोक की लहर

पश्चिम बंगाल की राजनीति के सबसे चतुर और प्रभावशाली चेहरों में से एक, मुकुल रॉय का सोमवार को निधन हो गया। उनके निधन के साथ ही बंगाल की राजनीति के एक ‘चाणक्य’ युग का अंत हो गया है। चार दशकों से अधिक के राजनीतिक करियर में मुकुल रॉय ने न केवल तृणमूल कांग्रेस के संगठन को मजबूत किया, बल्कि राज्य की सत्ता के समीकरणों को बदलने में भी मुख्य भूमिका निभाई।
मुकुल रॉय की पहचान एक ऐसे रणनीतिकार के रूप में थी, जो पर्दे के पीछे से विरोधी दलों में सेंध लगाने में माहिर थे। वामपंथ और कांग्रेस के कई कद्दावर नेताओं को पाला बदलवाकर तृणमूल में लाना उनकी सबसे बड़ी ताकत मानी जाती थी। हालांकि उनका सफर उतार-चढ़ाव भरा रहा। उन्होंने भाजपा का दामन थामा और २०२१ में विधायक बने, लेकिन बाद में फिर से अपनी पुरानी पार्टी तृणमूल कांग्रेस में लौट आए।
उनके निधन पर भाजपा नेता शुभेंदु अधिकारी ने गहरा शोक व्यक्त किया और उन्हें एक अनुभवी राजनेता बताया। वहीं, माकपा नेता शतरूप घोष ने कहा कि वैचारिक मतभेदों के बावजूद मुकुल रॉय का राजनीति में सकारात्मक योगदान था। कांग्रेस नेता रोहन मित्रा ने उन्हें एक ऐसा व्यक्तित्व बताया जो पुरानी और नई पीढ़ी की राजनीति के बीच एक कड़ी थे। मुकुल रॉय के जाने से न केवल तृणमूल बल्कि समूचे राजनीतिक गलियारे में एक ऐसी खाली जगह बन गई है, जिसे भरना नामुमकिन है।