बंगाल चुनाव २०२६: ६० लाख वोटरों पर फंसा पेंच, क्या समय पर होगा मतदान?

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव २०२६ से पहले राज्य में संवैधानिक संकट के बादल मंडराने लगे हैं। क्या बंगाल में राष्ट्रपति शासन लगने वाला है? मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के हालिया बयान ने इस चर्चा को तेज कर दिया है। चुनाव आयोग की वोटर लिस्ट और राज्यपाल के तबादले को लेकर राज्य सरकार और केंद्र के बीच ठन गई है।

क्या है पूरा विवाद? मौजूदा सरकार का कार्यकाल ७ मई को समाप्त हो रहा है। नियम के अनुसार इससे पहले चुनाव संपन्न हो जाने चाहिए। हालांकि, वोटर लिस्ट में अभी भी ६० लाख से अधिक नाम ‘विचाराधीन’ (Consideration) श्रेणी में हैं। बीजेपी का आरोप है कि तृणमूल कांग्रेस जानबूझकर इस प्रक्रिया को लटका रही है ताकि चुनाव में देरी हो। यदि समय पर चुनाव नहीं हुए, तो राज्य में राष्ट्रपति शासन लगना तय है।

ममता बनर्जी का तीखा हमला ममता बनर्जी ने केंद्र पर ‘ब्लूप्रिंट’ तैयार करने का आरोप लगाते हुए कहा, “तमिलनाडु में विवादों में रहे राज्यपाल को बंगाल क्यों भेजा जा रहा है? क्या यह राष्ट्रपति शासन लगाने की तैयारी है? मिस्टर प्रधानमंत्री और गृहमंत्री, आप राष्ट्रपति शासन लगा कर देखिए। इससे मेरा ही भला होगा, मुझे दो दिन चैन की नींद सोने का मौका मिलेगा।” उन्होंने बीजेपी को ‘हम्पटी डम्पटी ड्रैगन्स’ और ‘डर्टी पार्टी’ करार दिया।

बीजेपी की मांग: राष्ट्रपति शासन ही एकमात्र विकल्प दार्जिलिंग के बीजेपी सांसद राजू बिस्त ने कानून-व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए कहा कि पश्चिम बंगाल में जब चुनाव आयोग के अधिकारी ही सुरक्षित नहीं हैं, तो आम जनता का क्या होगा? उन्होंने साफ कहा कि बंगाल में निष्पक्ष चुनाव केवल राष्ट्रपति शासन के तहत ही संभव हैं। वहीं असीम सरकार ने दावा किया कि ममता बनर्जी खुद राष्ट्रपति शासन चाहती हैं ताकि वे जनता की सहानुभूति बटोर सकें।

तृणमूल नेता ब्रत्य बसु ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि बीजेपी के ‘गुंडों’ की बात राष्ट्रपति नहीं सुनेंगे और चुनाव समय पर ही होंगे। अब देखना यह है कि चुनाव आयोग इतनी जल्दी ६० लाख वोटरों का सत्यापन कर पाता है या नहीं।

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