खत्म नहीं हुआ रंगों का खुमार! बंगाल के इस गांव में 200 साल से मनाई जा रही है ‘पंचम डोल’

जहां पूरे देश में होली का खुमार उतर चुका है, वहीं पश्चिम बंगाल के कुछ हिस्सों में रंगों का उत्सव एक बार फिर जीवंत हो उठा है। डोल पूर्णिमा के ठीक पांच दिन बाद मनाए जाने वाले इस अनोखे त्यौहार को ‘पंचम डोल’ कहा जाता है। पश्चिम वर्धमान जिले के आसनसोल स्थित कुल्टी के मिठानी गांव और बांकुड़ा के पुरंदरपुर में यह 200 साल पुरानी परंपरा आज भी पूरी श्रद्धा के साथ निभाई जा रही है।

मिठानी गांव के चट्टराज परिवार के कुलदेवता वासुदेव चंद्र जिउ इस उत्सव के केंद्र में हैं। परंपरा के अनुसार, पंचम डोल की पूर्व संध्या पर ‘होलिका दहन’ या ‘चांचर’ का आयोजन किया जाता है। परिवार की तीन नारायण शिलाओं को एक साथ सिंहासन पर विराजमान कर भव्य शोभायात्रा निकाली जाती है। अगले दिन सुबह, देवताओं को गुलाल अर्पित करने के बाद पूरे गांव में होली खेली जाती है।

चट्टराज परिवार की बहू प्रियंका चट्टराज और बेटियों का कहना है कि यह उत्सव अब एक पारिवारिक मिलन समारोह बन गया है। दूर-दराज के शहरों में ब्याही गई बेटियां भी इस खास दिन पर गांव लौट आती हैं। ग्रामीणों का मानना है कि यह परंपरा उनके पूर्वजों की विरासत है, जिसे वे अपनी अगली पीढ़ी को सौंपना चाहते हैं। आधुनिकता के इस दौर में 200 साल पुरानी यह ‘पंचम डोल’ परंपरा बंगाल की समृद्ध सांस्कृतिक विविधता का एक अनूठा उदाहरण है।

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *