सिलेंडर की टेंशन खत्म! पश्चिम बंगाल के इस गांव में ‘गोबर’ से जल रहे हैं चूल्हे, युद्ध के बीच अनोखी मिसाल

मध्य पूर्व में जारी युद्ध के कारण जब पूरे भारत में एलपीजी (LPG) की कीमतों में आग लगी है, तब पश्चिम वर्धमान के कांकसा ब्लॉक से एक राहत भरी खबर सामने आ रही है। गोपालपुर गांव के क्षेत्रनाथ गड़ाई और अमजान गड़ाई के परिवारों ने पारंपरिक ‘गोबर गैस’ तकनीक को अपनाकर दुनिया को महंगे ईंधन का विकल्प दिखा दिया है।

कैसे काम करता है यह मॉडल? गड़ाई परिवार के पास कई मवेशी हैं। उन्होंने अपने घर के पास एक बायो-गैस प्लांट स्थापित किया है। गोबर को एक टैंक में जमा कर उससे गैस बनाई जाती है, जो पाइप के जरिए सीधे रसोई के चूल्हे तक पहुंचती है। क्षेत्रनाथ बताते हैं, “हमें गैस के लिए एक रुपया भी खर्च नहीं करना पड़ता। युद्ध के कारण सिलेंडर के दाम चाहे जितने बढ़ें, हमारी रसोई पर इसका कोई असर नहीं पड़ता।”

सरकार से मदद की गुहार: हालांकि, ये प्लांट काफी पुराने हो चुके हैं और इनके रखरखाव के लिए सरकारी मदद की दरकार है। इस सफलता की कहानी जब दुर्गापुर के एसडीएम सुमन विश्वास तक पहुंची, तो उन्होंने तुरंत संज्ञान लिया। उन्होंने कहा कि प्रशासन इस मॉडल का निरीक्षण करेगा और यदि संभव हुआ तो इसे बड़े पैमाने पर लागू करने की कोशिश की जाएगी ताकि गांवों को ईंधन के मामले में आत्मनिर्भर बनाया जा सके।

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