मोहम्मद सलीम की बढ़ी मुश्किलें! बहरामपुर से लेकर जंगलमहल तक, सीटों के समीकरण में उलझा ‘लाल दुर्ग’

पश्चिम बंगाल में अपनी खोई हुई सियासी जमीन वापस पाने के लिए वाम मोर्चा (Left Front) एक बार फिर संघर्ष कर रहा है। विधानसभा में ‘शून्य’ के आंकड़े को पार करने के लिए मोहम्मद सलीम और बिमान बसु लगातार कोशिशें कर रहे हैं, लेकिन गठबंधन का गणित सुलझने के बजाय और उलझता जा रहा है। विशेष रूप से कांग्रेस के अकेले चुनाव लड़ने के फैसले ने वाम दलों के लिए मुश्किलें खड़ी कर दी हैं। अब अलीमुद्दीन स्ट्रीट के नेताओं को ज्योति बसु के दिखाए ‘साझा मंच’ वाले रास्ते पर ही भरोसा है।

सूत्रों के मुताबिक, इस बार गठबंधन में सीटों का बंटवारा सबसे बड़ी चुनौती है। वाम मोर्चे के साथ चुनाव लड़ने को तैयार आईएसएफ (ISF) ने अपनी मांगें बढ़ा दी हैं। नौशाद सिद्दीकी की पार्टी उन 26 सीटों के अलावा और भी सीटों पर दावा कर रही है, जहां उनकी पकड़ मजबूत है। उत्तर 24 परगना की कुछ सीटों को लेकर सीपीआईएम और आईएसएफ के बीच गतिरोध बना हुआ है। नौशाद का साफ कहना है कि 2021 वाली गलती नहीं दोहराई जानी चाहिए, जब गठबंधन होने के बावजूद फॉरवर्ड ब्लॉक ने उनके खिलाफ उम्मीदवार उतार दिया था।

दूसरी ओर, वाम मोर्चा अब सीपीआई (एमएल) लिबरेशन और जंगलमहल में जेएलकेएम (JLKM) जैसे छोटे दलों को भी साथ लेने की कोशिश कर रहा है। रामचन्द्र डोम जैसे वरिष्ठ नेताओं का मानना है कि कांग्रेस के हटने से धर्मनिरपेक्ष मोर्चा थोड़ा कमजोर जरूर हुआ है, लेकिन अन्य सहयोगियों के साथ मिलकर एक मजबूत विकल्प तैयार किया जा रहा है। चुनाव आयोग की टीम के दौरे के बाद अब किसी भी वक्त तारीखों का एलान हो सकता है, ऐसे में वाम दलों के लिए समय कम और चुनौतियां ज्यादा हैं।

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