“कोई पिता बेटे के लिए मौत नहीं मांगता, पर मैं मजबूर हूँ!” सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर फूट-फूट कर रोए पिता

“दुनिया का कोई भी पिता अपने बेटे के लिए ऐसा नहीं करता, लेकिन…।” अपनी बात पूरी करने से पहले ही अशोक राणा की आंखें भर आईं। यह उन आंसुओं की कहानी है जो पिछले 13 साल से सूख चुके थे। गाजियाबाद के रहने वाले अशोक राणा और उनकी पत्नी निर्मला के बेटे हरीश राणा को सुप्रीम कोर्ट ने ‘पैसिव यूथेनेशिया’ (इच्छा मृत्यु) की अनुमति दे दी है। यह फैसला एक बेबस पिता की उस लंबी लड़ाई का अंत है, जिसमें उन्होंने अपने बेटे को तिल-तिल कर मरते देखा था।

हरीश राणा कभी बीटेक का छात्र था और बॉडी बिल्डिंग का शौकीन था। साल 2013 में एक हादसे के दौरान वह पांचवीं मंजिल से गिर गया, जिससे उसके दिमाग में गहरी चोट लगी। तब से वह बिस्तर पर है, न बोल सकता है, न हिल सकता है। बेटे के इलाज में अशोक राणा ने अपनी जिंदगी भर की कमाई लगा दी, दिल्ली का घर तक बेच दिया। आज वह गाजियाबाद के एक छोटे से फ्लैट में रहते हैं और अपनी गुजर-बसर के लिए सुबह सैंडविच बेचते हैं।

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की बेंच ने एम्स (AIIMS) को निर्देश दिया है कि हरीश को पैलिएटिव केयर में भर्ती किया जाए और गरिमा के साथ उसका लाइफ सपोर्ट हटा दिया जाए। अदालत ने माना कि बुजुर्ग माता-पिता के बाद हरीश की देखभाल करने वाला कोई नहीं होगा, इसलिए उसे इस कष्टदायी जीवन से मुक्ति देना ही एकमात्र मानवीय रास्ता है। भारी मन से अशोक राणा ने कहा कि वह नहीं चाहते कि देश के किसी भी माता-पिता को अपने बच्चे के लिए मौत मांगनी पड़े, लेकिन हरीश को इस दर्द से आजाद करना अब जरूरी था।

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