इतिहास में पहली बार! मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ संसद में अविश्वास प्रस्ताव, क्या जाएगी कुर्सी?

भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में आज एक अभूतपूर्व घटना घटी। देश के मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार को उनके पद से हटाने के लिए विपक्षी दलों ने एकजुट होकर संसद के दोनों सदनों में नोटिस पेश किया है। भारत में यह अपनी तरह का पहला मामला है जब किसी मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ महाभियोग जैसी प्रक्रिया शुरू की गई है। विपक्ष का सीधा आरोप है कि ज्ञानेश कुमार स्वतंत्र रूप से कार्य करने के बजाय भारतीय जनता पार्टी के ‘एजेंट’ के रूप में काम कर रहे हैं।

कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस (TMC), और आम आदमी पार्टी (AAP) सहित ‘इंडिया’ गठबंधन के सांसदों ने इस नोटिस पर हस्ताक्षर किए हैं। सूत्रों के अनुसार, लोकसभा के १३० और राज्यसभा के ६३ सांसदों ने इस प्रस्ताव का समर्थन किया है। आरोप है कि मतदाता सूची के विशेष संशोधन (SIR) प्रक्रिया के दौरान जानबूझकर भाजपा को लाभ पहुँचाने की कोशिश की गई है।

गंभीर आरोप और जांच की मांग: मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ सात प्रमुख आरोप लगाए गए हैं। विपक्षी नेताओं का कहना है कि आयोग ने गैर-भाजपा शासित राज्यों, विशेषकर पश्चिम बंगाल में अल्पसंख्यकों और पात्र मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए हैं। इसके अलावा, कई जीवित व्यक्तियों को सूची में ‘मृत’ घोषित कर दिया गया। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इस मुद्दे पर कड़ा रुख अपनाते हुए दिल्ली में चुनाव आयोग के मुख्यालय का दौरा किया था और हाल ही में कोलकाता के मेट्रो चैनल पर ५ दिनों का धरना भी दिया था।

हटाने की संवैधानिक प्रक्रिया: मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाना कोई आसान काम नहीं है। भारतीय संविधान के अनुसार, उन्हें केवल उसी प्रक्रिया से हटाया जा सकता है जिससे सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को हटाया जाता है। इसके लिए संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत की आवश्यकता होती है। यदि सदन में उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों का दो-तिहाई बहुमत इस प्रस्ताव के पक्ष में आता है, तभी राष्ट्रपति उन्हें पदमुक्त कर सकते हैं। ‘जजेस इंक्वायरी एक्ट, १९६८’ के तहत, दोनों सदनों में प्रस्ताव स्वीकार होने के बाद एक जांच समिति गठित की जाएगी।

विपक्ष के इस कदम ने केंद्र सरकार को रक्षात्मक मुद्रा में ला दिया है। अब देखना यह है कि क्या संसद में विपक्ष अपनी ताकत के बल पर इस प्रस्ताव को अंजाम तक पहुँचा पाता है या यह केवल एक राजनीतिक दबाव की रणनीति बनकर रह जाएगा।

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