भारतीय संसद में पहली बार! मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ महाभियोग, ममता बनर्जी ने संभाली कमान

भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में शुक्रवार का दिन एक बड़े मोड़ के रूप में दर्ज हो गया। देश के मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ ‘इंडिया’ गठबंधन के विपक्षी दलों ने एकजुट होकर संसद में उन्हें पद से हटाने (इम्पिचमेंट) का नोटिस पेश किया है। भारत के संसदीय इतिहास में यह पहली बार है जब किसी मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ इस तरह का कड़ा कदम उठाया गया है।
ममता बनर्जी की बड़ी भूमिका: इस पूरी कवायद के पीछे पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस (TMC) की प्रमुख ममता बनर्जी की मुख्य भूमिका मानी जा रही है। पिछले कुछ महीनों से ममता बनर्जी मतदाता सूची में गड़बड़ी के आरोपों को लेकर ज्ञानेश कुमार पर हमलावर रही हैं। उन्होंने उन्हें ‘वैनिश कुमार’ (Vanish Kumar) तक कह डाला था। तृणमूल कांग्रेस की पहल पर ही विपक्षी दलों के कुल १९३ सांसदों ने इस प्रस्ताव पर हस्ताक्षर किए हैं, जिनमें लोकसभा के १३० और राज्यसभा के ६३ सांसद शामिल हैं।
लगाए गए ७ संगीन आरोप: संसद में पेश किए गए नोटिस में मुख्य चुनाव आयुक्त पर सात गंभीर आरोप लगाए गए हैं। विपक्ष का दावा है कि ज्ञानेश कुमार का व्यवहार पूरी तरह से पक्षपातपूर्ण और भेदभावपूर्ण रहा है। प्रमुख आरोपों में शामिल हैं:
- चुनावी धोखाधड़ी की जांच में जानबूझकर बाधा डालना।
- लाखों पात्र मतदाताओं को उनके मताधिकार से वंचित करना।
- सत्ताधारी दल (बीजेपी) के इशारे पर चुनाव प्रक्रिया को प्रभावित करना।
क्या है हटाने की संवैधानिक प्रक्रिया? भारतीय संविधान के अनुच्छेद ३२४(५) के तहत, मुख्य चुनाव आयुक्त को केवल उसी आधार और प्रक्रिया से हटाया जा सकता है, जैसे सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को हटाया जाता है। इसके लिए संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत की आवश्यकता होती है। सदन में उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों का कम से कम दो-तिहाई बहुमत इस प्रस्ताव के पक्ष में होना चाहिए। इसके बाद, राष्ट्रपति के आदेश पर ही उन्हें पदमुक्त किया जा सकता है।
राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि भले ही विपक्ष के पास फिलहाल बहुमत का आंकड़ा न हो, लेकिन इस कदम ने चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर एक बड़ा बहस छेड़ दी है। विपक्षी खेमे ने साफ कर दिया है कि वे चुनाव प्रक्रिया में किसी भी प्रकार की धांधली को बर्दाश्त नहीं करेंगे।