नियम तोड़ा तो संस्था होगी जिम्मेदार; अंतरराष्ट्रीय लेनदेन के लिए 1 अक्टूबर तक की मोहलत

भारत में डिजिटल लेन-देन करने वालों के लिए एक महत्वपूर्ण खबर है। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने ऑनलाइन धोखाधड़ी और फिशिंग हमलों पर लगाम लगाने के लिए डिजिटल पेमेंट सिस्टम में बड़े बदलाव का ऐलान किया है। 1 अप्रैल से सभी डिजिटल ट्रांजेक्शन के लिए ‘टू-फैक्टर ऑथेंटिकेशन’ (2FA) को अनिवार्य कर दिया गया है। इसका मतलब है कि अब केवल पिन या पासवर्ड से काम नहीं चलेगा, बल्कि सुरक्षा की एक अतिरिक्त परत को पार करना होगा।

आरबीआई के दिशा-निर्देशों के अनुसार, सुरक्षा के इन दो कारकों में पासवर्ड, पिन, एसएमएस ओटीपी, हार्डवेयर टोकन या फिंगरप्रिंट और फेसियल रिकग्निशन जैसे बायोमेट्रिक शामिल हो सकते हैं। नियम यह है कि कम से कम एक कारक ‘डायनेमिक’ होना चाहिए, जो हर ट्रांजेक्शन के लिए नया जेनरेट होगा (जैसे ओटीपी)। बैंक और फिनटेक कंपनियां अपने ग्राहकों को यह विकल्प दे सकेंगी कि वे सुरक्षा की कौन सी पद्धति चुनना चाहते हैं।

रिजर्व बैंक ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई संस्थान इन नियमों का पालन नहीं करता है और उसके बाद कोई फ्रॉड होता है, तो इसकी पूरी जिम्मेदारी उस संस्था की होगी। घरेलू लेनदेन के लिए यह नियम 1 अप्रैल से लागू होगा, जबकि अंतरराष्ट्रीय लेनदेन के लिए 1 अक्टूबर तक का समय दिया गया है। पिछले एक दशक में यूपीआई (UPI) और मोबाइल वॉलेट के बढ़ते चलन के बीच, सुरक्षा को और अधिक मजबूत बनाने के लिए आरबीआई का यह कदम गेम-चेंजर साबित होगा।

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