ट्रंप का ४८ घंटे का अल्टीमेटम! क्या ईरान के साथ गद्दारी करेगा चीन? युद्ध के मुहाने पर दुनिया

दुनिया इस वक्त बारूद के ढेर पर बैठी है। तेल आपूर्ति मार्ग ठप हैं, मिसाइलें दागी जा रही हैं और वैश्विक बाजार कराह रहा है। इस महासंकट के बीच, ईरान का सबसे बड़ा ‘साझेदार’ होने का दम भरने वाला चीन अब दूरी बनाता नजर आ रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने तेहरान को ४८ घंटे का अल्टीमेटम देते हुए धमकी दी है कि यदि हर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को तुरंत नहीं खोला गया, तो ईरान के बिजली केंद्रों को ‘निश्नाबूद’ कर दिया जाएगा।
यूके चाइना ट्रांसपेरेंसी के ट्रस्टी हॉवर्ड झांग ने चीन के इस दोहरे रवैये को उजागर किया है। झांग के अनुसार, चीन की ‘रणनीतिक साझेदारी’ केवल कागजों तक सीमित है। उन्होंने कहा, “चीन ने ईरान को केवल कूटनीतिक सहानुभूति और संयम बरतने की खोखली अपील की है। उसने तेहरान को किसी भी प्रकार की सैन्य सुरक्षा या भारी हस्तक्षेप का प्रस्ताव नहीं दिया है, जो उसे सीधे तौर पर अमेरिका के खिलाफ खड़ा कर दे।”
यह तनाव तब और बढ़ गया जब इजरायल ने लेबनान में अपने अभियान का विस्तार करते हुए कास्मिया पुल को तबाह कर दिया, जिसे जमीनी हमले की शुरुआत माना जा रहा है। दूसरी ओर, कच्चे तेल की कीमतों में इस साल ७०% से अधिक का उछाल आया है, जिससे ट्रंप पर घरेलू दबाव भी बढ़ रहा है।
हॉवर्ड झांग का तर्क है कि चीन का गठबंधन तंत्र ‘पद सोपान’ (Hierarchy) पर आधारित है। इस सूची के केंद्र में रूस है, जबकि पाकिस्तान अपनी भौगोलिक स्थिति के कारण चीन के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। चीन पाकिस्तान को केवल एक मित्र नहीं, बल्कि अपने पश्चिमी मोर्चे की सुरक्षा दीवार मानता है। इसके विपरीत, ईरान चीन के लिए केवल एक ‘बाधक’ शक्ति और ईंधन आपूर्तिकर्ता है। झांग स्पष्ट करते हैं कि चीन कभी भी तेहरान की खातिर युद्ध का जोखिम नहीं उठाएगा। चीन के लिए महत्वपूर्ण यह नहीं है कि वह किसे अपना ‘साझेदार’ कहता है, बल्कि यह है कि वह उस देश के हितों के लिए अपनी रणनीतिक आजादी को दांव पर लगाने के लिए कितना तैयार है।