“बंगाल में सिर्फ 23 ट्रांसफर, यूपी-महाराष्ट्र में आंकड़ा कहीं ज्यादा!” हाईकोर्ट में चुनाव आयोग की दलील

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव की घोषणा के बाद से राज्य के वरिष्ठ नौकरशाहों और पुलिस अधिकारियों के ताबड़तोड़ तबादलों को लेकर कलकत्ता उच्च न्यायालय में दायर जनहित याचिका पर सुनवाई पूरी हो गई है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और सत्ताधारी दल द्वारा आयोग के इन फैसलों को ‘राजनीति से प्रेरित’ बताए जाने के बाद यह मामला कानूनी पचड़े में फंस गया है। मुख्य न्यायाधीश सुजॉय पाल और न्यायमूर्ति पार्थसारथी सेन की खंडपीठ ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है।

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील कल्याण बनर्जी ने चुनाव आयोग की मंशा पर गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने पूछा, “अगर निष्पक्षता की बात है, तो केवल राज्य के अधिकारियों को ही क्यों निशाना बनाया गया? सीआईएसएफ या बीएसएफ के महानिदेशकों का तबादला क्यों नहीं किया गया?” वहीं, राज्य के एडवोकेट जनरल किशोर दत्त ने संवैधानिक तर्क देते हुए कहा कि आयोग को केवल लिपिकीय (clerical) कर्मचारियों के फेरबदल का अधिकार है, न कि डीजी और मुख्य सचिव जैसे उच्च पदों पर आसीन अधिकारियों के साथ छेड़छाड़ करने का।

जवाब में चुनाव आयोग के वकील ने अन्य राज्यों के आंकड़े पेश करते हुए कहा कि पश्चिम बंगाल में तुलनात्मक रूप से बहुत कम तबादले हुए हैं। उन्होंने बताया कि बिहार में 48, महाराष्ट्र में 61 और उत्तर प्रदेश में 83 अधिकारियों को बदला गया था, जबकि बंगाल में यह संख्या केवल 23 है। आयोग ने यह भी स्पष्ट किया कि सुप्रीम कोर्ट ने पहले भी ऐसे प्रशासनिक फैसलों में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया है। अदालत ने अब आयोग को सोमवार तक संबंधित दस्तावेज जमा करने का निर्देश दिया है, जिसके बाद अंतिम फैसला सुनाया जाएगा।

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