सिब्बल की गुहार और कोर्ट की फटकार! क्या बंगाल में लगेगा राष्ट्रपति शासन? सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी से हड़कंप

मालदा के कालियाचक में न्यायिक अधिकारियों के साथ हुई बदसलूकी और हमले की घटना ने पूरे देश को स्तब्ध कर दिया है। इस मामले की गंभीरता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सीधे हस्तक्षेप किया है और राज्य प्रशासन की भूमिका पर कड़े सवाल उठाए हैं। मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत और न्यायमूर्ति जयमाल्य बागची की पीठ ने इस घटना को ‘कानून और व्यवस्था का पूर्ण रूप से टूटना’ (Complete Breakdown of Law and Order) करार दिया है। कोर्ट ने कड़ी नाराजगी जताते हुए मालदा के जिलाधिकारी (DM) और पुलिस अधीक्षक (SP) को कारण बताओ नोटिस जारी किया है।

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों ने राज्य सरकार के लिए मुश्किल खड़ी कर दी है। अदालत ने कहा कि जजों की सुरक्षा सुनिश्चित करना राज्य की जिम्मेदारी थी, जिसमें वह विफल रही है। कोर्ट ने इस मामले में सीबीआई (CBI) या एनआईए (NIA) जांच की संभावना भी जताई है। राज्य की ओर से पेश दिग्गज वकील कपिल सिब्बल ने अदालत से ‘Complete Breakdown of Law and Order’ वाली टिप्पणी को हटाने का अनुरोध किया। सिब्बल का तर्क था कि इस तरह की टिप्पणी के भविष्य में गंभीर राजनीतिक और प्रशासनिक परिणाम हो सकते हैं। हालांकि, अदालत ने फिलहाल इस पर कोई रियायत नहीं दी है।

पीठ ने यह भी टिप्पणी की कि पश्चिम बंगाल वर्तमान में अत्यधिक राजनीतिक रूप से विभाजित है। अदालत ने पूछा कि खुफिया जानकारी होने के बावजूद जजों को सुरक्षित स्थान पर क्यों नहीं पहुँचाया गया? दूसरी ओर, चुनाव आयोग के वकील ने कहा कि कोर्ट की टिप्पणी जमीनी हकीकत को दर्शाती है। कोलकाता उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के पत्र के आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य सचिव, डीजीपी और मुख्य निर्वाचन अधिकारी से विस्तृत रिपोर्ट मांगी है। इस घटना ने बंगाल प्रशासन की कार्यशैली और वीवीआईपी सुरक्षा पर एक बड़ा सवालिया निशान लगा दिया है।

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