दादा साहब फाल्के से रणबीर कपूर तक: १०० साल के सिनेमाई इतिहास में ऐसे बदली ‘रामायण’

भारतीय सिनेमा और ‘रामायण’ का रिश्ता सदियों पुराना है। आज हर तरफ रणबीर कपूर की आने वाली फिल्म ‘रामायण’ की चर्चा है, जो २०२६ और २०२७ की दिवाली पर रिलीज होने वाली है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि रणबीर से पहले पिछले १०० वर्षों में इस महाकाव्य को भारतीय पर्दे पर कई बार अलग-अलग अंदाज में पेश किया जा चुका है?

पर्दे पर रामायण की यात्रा १९१७ में शुरू हुई थी, जब दादा साहब फाल्के ने मूक फिल्म ‘लंका दहन’ बनाई थी। इसमें हनुमान जी के लंका अभियान को मुख्य रूप से दिखाया गया था। इसके बाद १९३१ में वी. शांताराम की ‘चंद्रसेना’ आई, जिसने इस महाकाव्य के कुछ अनछुए पहलुओं को उजागर किया। १९४० और ५० के दशक में विजय भट्ट की फिल्म ‘राम राज्य’ एक सांस्कृतिक मील का पत्थर साबित हुई—यह इकलौती ऐसी फिल्म थी जिसे महात्मा गांधी ने देखा था। दक्षिण भारतीय सिनेमा में ‘भूकैलास’ जैसी फिल्मों ने रावण के चरित्र को केंद्र में रखकर कहानी कहने का नया प्रयोग किया।

आधुनिक दौर में भारत और जापान के सहयोग से बनी एनिमेटेड फिल्म ‘रामायण: द लीजेंड ऑफ प्रिंस रामा’ को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सराहा गया। हाल ही में प्रभास और कृति सेनन की ‘आदिपुरुष’ ने इसे बड़े पैमाने पर दिखाने की कोशिश की, लेकिन फिल्म अपने खराब वीएफएक्स और संवादों के कारण विवादों में घिरी रही। अब सबकी नजरें नितेश तिवारी और रणबीर कपूर की ‘रामायण’ पर टिकी हैं, जिससे दर्शकों को एक भव्य और क्लासिक अनुभव की उम्मीद है।

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