स्मार्टफोन से भी पीछे था अपोलो मिशन का कंप्यूटर, फिर आज चांद पर उतरने में देरी क्यों?

1969 में नील आर्मस्ट्रांग के चांद पर कदम रखने के बाद से तकनीक में क्रांतिकारी बदलाव आए हैं। आज हमारे मोबाइल फोन में अपोलो मिशन के कंप्यूटरों से कहीं ज्यादा ताकत है। इसके बावजूद, नासा के आर्टेमिस-2 मिशन के चारों अंतरिक्ष यात्री—रीड वाइजमैन, क्रिस्टीना कोच, विक्टर ग्लोवर और जेरेमी हैनसेन—चांद की सतह पर नहीं उतरेंगे। वे केवल चंद्रमा की परिक्रमा करेंगे और पृथ्वी पर वापस लौट आएंगे।
तकनीकी सुरक्षा और परीक्षण आर्टेमिस-2 का मुख्य उद्देश्य मानवयुक्त ओरियन (Orion) अंतरिक्ष यान की प्रणालियों का परीक्षण करना है। चूंकि 1972 के बाद से कोई भी मानव चंद्रमा के करीब नहीं गया है, इसलिए नासा सीधे लैंडिंग का जोखिम नहीं लेना चाहता। यह मिशन यह सुनिश्चित करेगा कि अंतरिक्ष यात्री गहरे अंतरिक्ष में सुरक्षित रह सकें और यान का संचार तंत्र सही ढंग से काम करे। इस यात्रा के दौरान वे चंद्रमा के उस हिस्से को भी देखेंगे जो पृथ्वी से दिखाई नहीं देता।
लैंडिंग के लिए 2028 तक का इंतज़ार चंद्रमा की सतह पर उतरने के लिए एक विशेष ‘लैंडर’ की आवश्यकता होती है। नासा इस बार एलन मस्क की कंपनी स्पेसएक्स के ‘स्टारशिप’ का उपयोग करने की योजना बना रहा है। लैंडर के विकास और नए स्पेससूट के निर्माण में हो रही देरी के कारण, वास्तविक लैंडिंग अब आर्टेमिस-4 मिशन (संभावित 2028) तक टल गई है।
नया अंतरिक्ष युद्ध: अमेरिका बनाम चीन आज की चंद्रमा की दौड़ केवल झंडा फहराने के लिए नहीं, बल्कि संसाधनों पर कब्जे के लिए है। चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर बर्फ और दुर्लभ धातुओं का भंडार है। अमेरिका और चीन दोनों ही इस क्षेत्र में पहले पहुंचना चाहते हैं। नासा का आर्टेमिस प्रोग्राम चंद्रमा पर एक स्थायी बेस बनाने और भविष्य में मंगल ग्रह तक पहुंचने की सीढ़ी है।