सबरीमाला मामले में सुप्रीम कोर्ट की बड़ी टिप्पणी धार्मिक कुरीतियों पर न्यायिक समीक्षा का अधिकार हमारा

सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर चल रही कानूनी बहस ने एक नया मोड़ ले लिया है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि वह धार्मिक प्रथाओं की न्यायिक समीक्षा करने का पूर्ण अधिकार रखता है। अदालत ने जोर देकर कहा कि अगर कोई धार्मिक परंपरा अंधविश्वास या सामाजिक बुराई की श्रेणी में आती है, तो न्यायपालिका मूकदर्शक बनकर नहीं बैठ सकती। यह मामला अब व्यक्तिगत धार्मिक स्वतंत्रता और संवैधानिक समानता के बीच एक बड़े विमर्श का रूप ले चुका है।
धार्मिक प्रथा या अंधविश्वास अदालत की सख्त दलील
न्यायमूर्ति सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि अदालत यह तय करने में सक्षम है कि कौन सी प्रथा धार्मिक है और कौन सी महज एक अंधविश्वास। कोर्ट ने तर्क दिया कि केवल संसद ही ऐसे मामलों में अंतिम निर्णय लेने वाली संस्था नहीं हो सकती। जजों ने कहा कि यदि कोई प्रथा समाज की अंतरात्मा को झकझोरती है, तो न्यायिक हस्तक्षेप अनिवार्य हो जाता है।
अपनी बात को मजबूती से रखने के लिए शीर्ष अदालत ने सती प्रथा, जादू-टोना और नरभक्षण जैसे उदाहरण पेश किए। कोर्ट का मानना है कि जिस तरह इन कुप्रथाओं को धर्म के नाम पर जारी रखने की अनुमति नहीं दी जा सकती, उसी तरह अन्य प्रथाओं की भी नैतिकता और सार्वजनिक व्यवस्था के आधार पर जांच की जानी चाहिए।
सरकार और न्यायपालिका के बीच कानूनी मतभेद
सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सरकार का पक्ष रखते हुए कहा कि एक धर्मनिरपेक्ष अदालत को यह तय नहीं करना चाहिए कि क्या अंधविश्वास है, क्योंकि अदालत के पास धार्मिक बारीकियों का ज्ञान नहीं होता। उन्होंने तर्क दिया कि भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में एक स्थान की धार्मिक मान्यता दूसरे स्थान पर अंधविश्वास मानी जा सकती है।
हालांकि, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस एमएम सुंदरेश ने इस पर असहमति जताई। उन्होंने कहा कि सार्वजनिक नैतिकता और स्वास्थ्य के आधार पर अदालत को हस्तक्षेप करने का संवैधानिक अधिकार प्राप्त है। जस्टिस बीवी नागरत्ना ने यह भी जोड़ा कि किसी प्रथा की अनिवार्यता की जांच उसी धर्म की परंपराओं के आधार पर होनी चाहिए, न कि किसी बाहरी नजरिए से।
सबरीमाला विवाद की संवेदनशीलता
सबरीमाला मंदिर में 10 से 50 वर्ष की आयु की महिलाओं के प्रवेश पर रोक को लेकर सरकार का तर्क है कि यह भेदभाव नहीं बल्कि भगवान अयप्पा की ‘नैष्ठिक ब्रह्मचारी’ रूप वाली मान्यता से जुड़ा है। सरकार के अनुसार, हर धार्मिक परंपरा को केवल समानता के चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि धार्मिक आस्थाओं का भी सम्मान होना चाहिए। इसके विपरीत, अदालत इस बात पर विचार कर रही है कि क्या यह प्रतिबंध महिलाओं के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।
एक झलक में
- न्यायिक समीक्षा: सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वह धार्मिक प्रथाओं के अंधविश्वास होने की जांच कर सकता है।
- ऐतिहासिक संदर्भ: कोर्ट ने सती प्रथा और जादू-टोना का उदाहरण देकर हस्तक्षेप को जायज ठहराया।
- संवैधानिक आधार: हस्तक्षेप का मुख्य आधार सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य को बताया गया।
- अनिवार्य प्रथा: अदालत यह परखेगी कि क्या महिलाओं का प्रवेश रोकना धर्म का अनिवार्य हिस्सा है या नहीं।
- सरकार का पक्ष: सरकार इसे भगवान अयप्पा की मान्यताओं और परंपरा का मामला मानती है।